राष्ट्रीय
11-Mar-2026
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नैनीताल(ईएमएस)। उत्तराखंड की प्रसिद्ध सरोवर नगरी नैनीताल की पहचान और इसकी जीवनरेखा मानी जाने वाली नैनी झील को लेकर एक चौंकाने वाली वैज्ञानिक जानकारी सामने आई है। अब तक यह माना जाता था कि झील के किनारों और सुरक्षा दीवारों को नुकसान पहुंचाने के लिए मुख्य रूप से चूहे जिम्मेदार हैं, जो मिट्टी में बिल बनाकर संरचना को खोखला कर देते हैं। लेकिन विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के नवीनतम शोध ने इस धारणा को बदलते हुए एक नया तथ्य पेश किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, झील में मौजूद कुछ विशेष प्रजाति की मछलियां भी इसकी दीवारों को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। मत्स्य विशेषज्ञों का कहना है कि झील के किनारों और दीवारों के आसपास रहने वाली कुछ मछलियां भोजन की तलाश और प्राकृतिक व्यवहार के कारण मिट्टी के नरम हिस्सों में सुराख या बिल जैसी जगह बना लेती हैं। धीरे-धीरे इन बिलों के कारण दीवारों के आधार और आसपास की संरचना ढीली होने लगती है। जब मानसून के दौरान बारिश होती है या झील में पानी का दबाव बढ़ता है, तो ये कमजोर हिस्से गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। पंतनगर स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के मत्स्य विज्ञान विभाग के विशेषज्ञ डॉ. आशुतोष मिश्रा के अनुसार, झील में बहुतायत में पाई जाने वाली कॉमन कार्प मछली इस समस्या की मुख्य जड़ है। यह मछली भोजन की तलाश में झील की तली और किनारों की मिट्टी को लगातार खोदती रहती है। इस खुदाई की प्रक्रिया में ये मछलियां सुरक्षा दीवारों के पास गहरे सुराख बना देती हैं। समय के साथ यह प्रक्रिया दीवारों की नींव को अस्थिर कर देती है, जिससे भविष्य में बड़े भूस्खलन या धंसाव का खतरा उत्पन्न हो सकता है। यही कारण है कि प्रशासन ने अब इन कॉमन कार्प मछलियों को झील से बाहर निकालने का विशेष अभियान शुरू किया है। हालांकि, चूहों की भूमिका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। चूहे अक्सर झील के ऊपरी किनारों और सूखी मिट्टी में लंबी सुरंगें बना लेते हैं, जिससे मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है। लेकिन पानी के भीतर मछलियों द्वारा किया जा रहा यह साइलेंट डैमेज कहीं अधिक खतरनाक साबित हो रहा है। नैनीताल की पूरी अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग इस झील पर टिका है। हर साल लाखों पर्यटक यहां बोटिंग और प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेने आते हैं। ऐसे में झील की संरचनात्मक अखंडता को बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि झील के किनारों की नियमित वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए और पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित रखने के लिए हानिकारक प्रजातियों पर नियंत्रण जरूरी है। वर्तमान में झील विकास प्राधिकरण द्वारा इन मछलियों को निकालने का अभियान 17 मार्च तक चलाया जा रहा है, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर को भविष्य के खतरों से सुरक्षित रखा जा सके। वीरेंद्र/ईएमएस 11 मार्च 2026