लेख
12-Mar-2026
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शहीद-ए-आजम सरदार उधम सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन दीपस्तंभों में से एक हैं, जिनका नाम साहस और अटूट संकल्प का प्रतीक है। दूसरे शब्दों में कहें तो उधम सिंह (राम मोहम्मद सिंह आज़ाद) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारियों में से एक थे। उनके बचपन का नाम शेर सिंह था तथा उनका जन्म 26 दिसंबर 1899 को सुनाम,जिला संगरूर,पंजाब में हुआ था।उनके पिता का नाम सरदार टहल सिंह था, जो रेलवे ओवरसियर (चौकीदार) के रूप में कार्य करते थे तथा ​उनकी माता का नाम नारायण कौर था।पाठकों को बताता चलूं कि बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था, कहते हैं कि उनका पालन-पोषण अमृतसर के एक अनाथालय में हुआ था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार माता-पिता के साये के बिना, उन्हें और उनके बड़े भाई (मुक्ता सिंह) को अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी।यह भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा अनाथालय में ही रहकर पूरी की और वहीं से 1918 में मैट्रिक की परीक्षा पास की।13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए भीषण जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने उधमसिंह के जीवन की दिशा बदल दी। दरअसल, उस समय वे अमृतसर में ही थे, और कहा जाता है कि वे घायल लोगों को पानी पिला रहे थे। इस क्रूर घटना ने उनके मन पर बहुत ही गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने इस नरसंहार का बदला लेने का संकल्प लिया। वे इस घटना के लिए पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर को जिम्मेदार मानते थे। जलियांवाला बाग हत्याकांड पृष्ठभूमि:- दरअसल, 1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट अधिनियम-1919 (जिसे काला कानून भी कहा गया) पारित किया। इस कानून के तहत सरकार को यह अधिकार मिल गया था कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए गिरफ्तार कर सकती थी।इस अन्यायपूर्ण कानून का पूरे देश में विरोध हुआ। इसी विरोध के दौरान अमृतसर के लोकप्रिय नेताओं सैफुद्दीन किचलू और सत्यपाल को गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी रिहाई की मांग और रॉलेट एक्ट(अधिनियम) के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा आयोजित की गई। वैशाखी का दिन और विशाल भीड़:- 13 अप्रैल 1919 को वैशाखी का पर्व था। इसलिए लगभग 10,000 पुरुष, महिलाएँ और बच्चे जलियांवाला बाग में एकत्र हो गए थे। कई लोग राजनीतिक सभा के लिए आए थे, जबकि अनेक लोग केवल मेले के कारण वहाँ पहुँचे थे। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि उस समय जलियांवाला बाग कोई व्यवस्थित बगीचा नहीं था, बल्कि यह मकानों से घिरा एक बड़ा खाली मैदान था तथा वहाँ आने-जाने के लिए केवल एक संकरा प्रवेश मार्ग था और चारों ओर ऊँची दीवारें व मकान स्थित थे।जब इस विशाल सभा की सूचना ब्रिटिश अधिकारी रेजिनाल्ड डायर को मिली, तो वह लगभग 90 सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा। कहते हैं कि उसके साथ दो मशीनगनों से लैस बख्तरबंद गाड़ियाँ भी थीं, लेकिन बाग का रास्ता संकरा होने के कारण वे अंदर नहीं जा सकीं। गोलाबारी और भीषण नरसंहार:- जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के सैनिकों को भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने लगभग 10 मिनट तक लगातार गोलीबारी की और लगभग 1650 राउंड गोलियाँ चलाईं।गोलीबारी तब तक जारी रही जब तक गोला-बारूद लगभग समाप्त नहीं हो गया। चूँकि, सैनिकों ने सभी रास्तों को घेर लिया था, इसलिए लोग वहाँ से भाग नहीं सके और सैकड़ों लोग वहीं गिर पड़े।अपनी जान बचाने के लिए कई लोग बाग में स्थित एक कुएँ में कूद गए। बाद में उस कुएँ से 100 से अधिक शव निकाले गए। आज यह स्थान शहीदी कुआँ के नाम से प्रसिद्ध है और वहाँ स्मारक के रूप में सुरक्षित रखा गया है। मृतकों की संख्या और अमानवीय दमन:- जलियांवाला बाग हत्याकांड में मृतकों की संख्या को लेकर विभिन्न आँकड़े मिलते हैं।ब्रिटिश सरकारी अभिलेखों के अनुसार 379 लोग मारे गए और लगभग 200 घायल हुए।अमृतसर डिप्टी कमिश्नर कार्यालय की सूची में 484 शहीदों का उल्लेख मिलता है। वहीं पर जलियांवाला बाग की सूची में 388 शहीदों का उल्लेख है।भारतीय अनौपचारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और लगभग 2000 घायल हुए। ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार मृतकों में 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक छह सप्ताह का शिशु शामिल था। कहते हैं कि इस घटना के बाद पूरे अमृतसर में कर्फ्यू लगा दिया गया था और घायलों को अस्पताल ले जाने तक की अनुमति भी नहीं दी गई। परिणामस्वरूप, कई लोग रातभर तड़पते हुए दम तोड़ बैठे। नरसंहार के बाद अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया था और लोगों के आवागमन तथा संचार पर कड़ी पाबंदियाँ लगा दी गईं। वास्तव में, डायर ने शहर में कई कठोर आदेश लागू किए। इनमें सबसे कुख्यात था क्रॉलिंग ऑर्डर, जिसके तहत जिस गली में एक अंग्रेज महिला पर हमला हुआ था, वहाँ से गुजरने वाले भारतीयों को पेट के बल रेंगकर(क्रॉलिंग करते हुए) जाने के लिए मजबूर किया जाता था। इसके अतिरिक्त, कई स्थानों पर लोगों को सार्वजनिक रूप से कोड़े भी लगाए गए। ऊधम सिंह का प्रतिशोध:- जलियांवाला बाग की इस घटना ने ऊधम सिंह के मन में प्रतिशोध की तीव्र भावना उत्पन्न कर दी। अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए वे कई वर्षों तक अवसर की प्रतीक्षा करते रहे। दरअसल,उधम सिंह ने लगभग 21 साल तक धैर्य और संकल्प के साथ प्रतीक्षा की और अंततः अपने देशवासियों के लिए न्याय का प्रतीक बन गए। कहते हैं कि इस दौरान उन्होंने अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों की यात्राएँ भी कीं और विभिन्न क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे। सरल शब्दों में कहें तो अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए वे विभिन्न देशों (जैसे अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप) की यात्रा करते हुए 1934 में लंदन पहुँचे और वहां उन्होंने राम मोहम्मद सिंह आजाद नाम अपनाया, जो भारत की सांप्रदायिक एकता का प्रतीक था। सरदार उधमसिंह,भगतसिंह को वे अपना गुरू मानते थे। यहां पाठकों को बताता चलूं कि उधम सिंह, शहीद भगत सिंह से उम्र में बड़े थे, फिर भी वे उन्हें अपना गुरु और मार्गदर्शक मानते थे।1927 में जब वे भगत सिंह के कहने पर वापस भारत आए, तो उनके पास भारी मात्रा में हथियार और प्रतिबंधित साहित्य मिला, जिसके कारण उन्हें 5 साल की जेल हुई।​उनकी जेब में हमेशा भगत सिंह की एक तस्वीर रहती थी। इसके अलावा, उधमसिंह का गदर पार्टी(अमेरिका में सदस्य बनें) से सक्रिय जुड़ाव रहा।​वे महान क्रांतिकारी अजीत सिंह (शहीद भगत सिंह के चाचा) से बेहद प्रभावित थे और उनसे विदेश में मिले भी थे। उन्होंने भारत की आजादी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाने का काम किया।बहुत कम लोग जानते हैं कि लंदन में रहते हुए अपनी पहचान छिपाने और पैसे कमाने के लिए उन्होंने हॉलीवुड की फिल्मों में एक्स्ट्रा के तौर पर काम किया था।​उन्होंने एलिफैंट ब्वाय (1937) और द फोर फीदर्स (1939) जैसी फिल्मों में छोटे रोल भी किए थे। माइकल ओ’ड्वायर की हत्या:- अंततः 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में आयोजित एक सभा में उधमसिंह एक मोटी किताब के भीतर पिस्तौल छिपाकर पहुँचे। सभा के दौरान उन्होंने माइकल ओ’ड्वायर पर गोली चलाकर उसकी हत्या कर दी।इस प्रकार उन्होंने जलियांवाला बाग के शहीदों के प्रति लिया गया अपना संकल्प पूरा किया। हालांकि, इसके तुरंत बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।एक दिलचस्प तथ्य यह है कि ​कैक्सटन हॉल की घटना के बाद, उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की, बल्कि उन्होंने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी, क्योंकि वे चाहते थे कि पूरी दुनिया को पता चले कि भारतीय अपने अपमान और नरसंहार का बदला लेना जानते हैं। मुकदमा और फाँसी:- अदालत में उधमसिंह ने निर्भीक होकर कहा कि उन्होंने यह कार्य अपने देशवासियों पर हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए किया है। उनका प्रसिद्ध कथन था- मैंने यह इसलिए किया, क्योंकि वह इसके योग्य था। वह मेरे लोगों की भावनाओं को कुचलना चाहता था, इसलिए मैंने उसे कुचल दिया। मुकदमे के बाद 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविले जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई। यहां पाठकों को बताता चलूं कि लंदन की पेंटनविले जेल में कैद के दौरान, उधम सिंह ने 42 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जबरन खाना खिलाने की कोशिश की, लेकिन उनके हौसले को नहीं तोड़ सके। वे अंत तक अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। बाद में 1974 में उनकी अस्थियाँ भारत लाई गईं और उन्हें देश के महान शहीदों में सम्मानित स्थान दिया गया। गौरतलब है कि उनके अवशेषों(अस्थियाँ) के कुछ हिस्से अमृतसर के जलियांवाला बाग में भी रखे गए हैं। अंत में निष्कर्षतः यही कहूंगा कि, ऊधम सिंह का जीवन अदम्य साहस, देशभक्ति और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का महान उदाहरण है। जलियांवाला बाग जैसी भीषण घटना ने उनके मन में स्वतंत्रता और न्याय के लिए प्रबल संकल्प उत्पन्न किया, जिसे उन्होंने वर्षों बाद पूरा किया। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध की अमर गाथा बन गया। आज भी ऊधम सिंह का नाम देशभक्ति, त्याग और शहीदों के सम्मान के प्रतीक के रूप में श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। ऐसे महान क्रांतिकारी के जज्बे और उनकी शहादत को शत-शत नमन, विनम्र श्रद्धांजलि। (नील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 12 मार्च 26