राष्ट्रीय
13-Mar-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, समलैंगिक पुरुषों और महिला सेक्स वर्कर्स को संभावित रक्तदाताओं की सूची से बाहर रखने के अपने निर्णय का पुरजोर बचाव किया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कदम किसी समुदाय के प्रति भेदभाव की भावना से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों और स्वास्थ्य सुरक्षा मानकों के आधार पर उठाया गया है। सरकार के अनुसार, इन विशिष्ट समूहों में एचआईवी और अन्य संक्रामक रोगों का प्रसार आम आबादी की तुलना में कहीं अधिक पाया गया है, जो रक्तदान की सुरक्षा प्रक्रिया के लिए एक बड़ा जोखिम हो सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि राष्ट्रीय रक्त नीति का प्राथमिक लक्ष्य सबसे सुरक्षित डोनर पूल से रक्त प्राप्त करना है। उन्होंने अदालत को बताया कि स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों और विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि इन समूहों में संक्रमण का खतरा सामान्य लोगों के मुकाबले 6 से 13 गुना तक अधिक होता है। ऐसी स्थिति में, उच्च जोखिम वाले समूहों से रक्त या उसके घटक प्राप्त करना राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध होगा। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की वर्ष 2020-21 की वार्षिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए मंत्रालय ने अपने हलफनामे में कहा कि ट्रांसजेंडर, समलैंगिक पुरुषों और महिला सेक्स वर्कर्स में एचआईवी के अलावा हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी जैसे गंभीर संक्रमणों की दर भी काफी ऊंची है। मंत्रालय ने यह भी रेखांकित किया कि इस तरह के प्रतिबंध केवल भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दुनिया के कई विकसित और यूरोपीय देशों में भी यौन रूप से सक्रिय समलैंगिक पुरुषों और उच्च जोखिम वाले समूहों को रक्तदान से स्थायी रूप से वर्जित रखने के कड़े वैश्विक मानक लागू हैं। सरकार ने अदालत में इस बात पर विशेष जोर दिया कि यह मुद्दा केवल व्यक्तिगत अधिकारों या समानता के दावों तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए खून चढ़ाना जीवन बचाने का अंतिम विकल्प होता है। ऐसे में ट्रांसफ्यूजन-ट्रांसमिटेड इन्फेक्शन (रक्त चढ़ाने से होने वाले संक्रमण) के जोखिम को शून्य करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने अपनी दलील का समापन करते हुए कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के व्यापक हित और देश में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक आम जनता की असमान पहुंच जैसी जमीनी हकीकतों को देखते हुए यह एहतियात बरतना अनिवार्य है। वीरेंद्र/ईएमएस/13मार्च2026