- मोची से ‘शू आर्टिजन’ और नाई से ‘पर्सनल केयर प्रोवाइडर - जाति नहीं, कौशल से पहचान - संसदीय समिति का सुझाव नई दिल्ली (ईएमएस)। सदियों से पेशों के साथ जुड़ी जाति-आधारित पहचान को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी है। उद्योग संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ के तहत पारंपरिक व्यवसायों के नामों को आधुनिक और पेशेवर स्वरूप देने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि मोची, कुम्हार, नाई और धोबी जैसे पेशों को जातिगत पहचान से जोड़कर देखने की बजाय उन्हें उनके कौशल और कार्य के आधार पर पहचाना जाना चाहिए। समिति ने सुझाव दिया है कि मोची को अब जूते का कारीगर, कुम्हार को मिट्टी और सिरेमिक उत्पाद निर्माता, नाई (Barber) को व्यक्तिगत सौंदर्य सेवा प्रदाता (पर्सनल केयर सर्विस प्रोवाइडर) और धोबी को लॉन्ड्री एवं क्लीनिंग सर्विस प्रोवाइडर जैसे नामों से संबोधित किया जाए। रिपोर्ट के अनुसार, इन पारंपरिक व्यवसायों के नाम अक्सर जाति या किसी विशेष क्षेत्र से जुड़ जाते हैं, जिससे कई बार सामाजिक पूर्वाग्रह पैदा होते हैं। इसलिए समिति ने सिफारिश की है कि सरकार इन नामों को तर्कसंगत बनाकर पेशे-आधारित और समावेशी शब्दावली अपनाए, ताकि योजना पूरे देश में अधिक स्वीकार्य और प्रभावी बन सके। समिति का मानना है कि नामों में यह बदलाव केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि यह सामाजिक सोच में भी बदलाव लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इससे कारीगरों की पहचान उनके हुनर और पेशेवर कौशल से होगी, न कि उनकी जाति से। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि यह सिफारिश लागू होती है तो पारंपरिक कारीगरों को नई पहचान मिलने के साथ-साथ उनके पेशे की सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी। साथ ही युवाओं में इन कौशल-आधारित व्यवसायों के प्रति सम्मान और आकर्षण भी बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, संसदीय समिति की यह पहल “जाति से कौशल की ओर” समाज को ले जाने की एक महत्वपूर्ण कोशिश मानी जा रही है।