नई दिल्ली,(ईएमएस)। भारत में तुर्की के राजदूत अली मूरत एरसोय ने कहा है कि ईरान का युद्ध एशिया पर असर डाल रहा है। युद्ध ने बड़ी ताकतों की आपसी होड़ के कारण स्थिरता के पारंपरिक स्तंभों पर दबाव डाला है। साथ ही भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसी मध्यम ताकतों के लिए मौजूदा टूटी-फूटी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पुल बनने का रास्ता खोला है। उन्होंने भारत की तारीफ करते हुए कहा कि दिल्ली की भूमिका ज्यादा अहम हो गई है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एरसोय ने कहा कि आज के अंतरराष्ट्रीय माहौल में मध्यम ताकतें बड़ी ताकतों की होड़ की सिर्फ दर्शक बनकर नहीं रह गई हैं। भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देश अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अंदर जोड़ने वाली कड़ियों के तौर पर काफी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बहु-केंद्रित वास्तविकता की ओर बढ़ रही है, जहां स्थिरता की गारंटी कोई एक महाशक्ति नहीं है। तुर्की के राजदूत ने कहा कि मध्यम ताकतें अलग-अलग भौगोलिक केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखती हैं और वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता लाने वाले कारक के तौर पर काम करती हैं। उन्होंने कहा कि भारत अब एक स्थिर करने वाली ताकत के तौर पर अहम मुकाम रखता है। एरसोय ने कहा कि नई दिल्ली की विश्वसनीयता उसकी रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति प्रतिबद्धता से आती है। इससे भारत अलग-अलग साझेदारों के साथ अपने संबंध बनाए रखता है। इसी वजह से भारत की कूटनीति ऐसा मॉडल बन गई है, जिसकी प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है। भारत भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नए नियम-कायदे तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। एरसोय ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र और मंडल सिद्धांत का जिक्र किया, जो कि राजकाज का एक प्राचीन सिद्धांत है। एरसोय ने कहा कि इस सिद्धांत ने 2,000 साल से भी पहले आज की भू-राजनीतिक स्थितियों का अंदाजा लगा लिया था। इस विचार के मुताबिक स्थिरता केवल पक्के गठबंधनों से नहीं बल्कि रिश्तों के सावधानीपूर्वक प्रबंधन और संतुलन से आती है। एरसोय ने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष पर कहा कि तुर्की की भूमिका मुख्य रूप से संघर्षरत पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश तक सीमित रही है। तुर्की ने सभी पक्षों-अमेरिका, इजराइल और ईरान को बातचीत के लिए अंकारा में एक साथ लाने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उसे किसी भी पक्ष से कोई जवाब नहीं मिला। सिराज/ईएमएस 14मार्च26