-एआई दुरुपयोग पर जताई चिंता हैदराबाद,(ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) वकीलों के प्रशिक्षित दिमाग और न्यायाधीशों की नैतिक जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक कानूनी कार्यों में सहायक हो सकती है, लेकिन न्यायिक निर्णय लेने की क्षमता अभी भी मानव विवेक और अनुभव पर ही निर्भर करती है। तेलंगाना में आयोजित एक विधिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए जस्टिस नाथ ने शनिवार को कहा कि यदि समझदारी से उपयोग किया जाए तो एआई समय बचाने और कानूनी कामकाज के कुछ पहलुओं को आसान बनाने में मददगार साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि तकनीक किसी नोट या दस्तावेज का प्रारूप तैयार करने में सहायक हो सकती है, लेकिन उसे कानून बनाने या अंतिम निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। जस्टिस नाथ ने कहा कि एआई के गलत इस्तेमाल की आशंका के कारण न्यायिक व्यवस्था को इससे पूरी तरह दूरी भी नहीं बनानी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि एआई एक उपकरण है और इसे उपकरण की तरह ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि नई तकनीकों को संतुलित दृष्टिकोण के साथ अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट में एआई से तैयार गलत सामग्री और नकली कानूनी संदर्भों (साइटेशन) के इस्तेमाल को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। उनके अनुसार, गलत कानूनी संदर्भ केवल तकनीकी त्रुटि नहीं होते, बल्कि इससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी प्रभाव पड़ता है। जस्टिस नाथ ने कहा कि एआई के दुरुपयोग के कारण इसे पूरी तरह त्याग देना भी उचित नहीं है। इसका सही समाधान है, जानकारी के साथ इसका उपयोग, नैतिक अनुशासन और पेशेवर मानकों का पालन। उन्होंने लोगों से अपील की कि एआई का इस्तेमाल सावधानीपूर्वक किया जाए और इसकी सीमाओं को समझा जाए। सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सतीष चंद्र शर्मा और जस्टिस ए कुमार सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। जस्टिस नाथ ने कहा कि नई तकनीकें जहां कानूनी कार्यों को आसान बना सकती हैं, वहीं वे लापरवाही के नए रूप भी पैदा कर सकती हैं। एआई अपराध से निपटने में सहायक हो सकती है, लेकिन इसके साथ ही नए प्रकार के अपराधों की संभावना भी बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि तकनीक को केवल इसलिए अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह नई है, और केवल इसलिए स्वीकार भी नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह तेज और कुशल है। तकनीक का उपयोग सिद्धांतों, जिम्मेदारी और कानूनी मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। जस्टिस नाथ ने अंत में कहा कि न्याय व्यवस्था का भविष्य केवल प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण से सुरक्षित नहीं होगा। इसके लिए जरूरी है कि तकनीक कानून के मूल सिद्धांतों से जुड़ी रहे। कानून का शासन तकनीक पर नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं और ईमानदार लोगों पर निर्भर करता है। हिदायत/ईएमएस 14मार्च26