राज्य
14-Mar-2026
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:: मेडिकल टूरिज्म के नाम पर वीआईपी कल्चर को बढ़ावा; 600 रूपये की ओपीडी और इंसेंटिव के खेल में कहीं बलि न चढ़ जाए गरीब मरीज :: इंदौर (ईएमएस)। मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में अब सेवा की जगह मुनाफा मुख्य उद्देश्य बनता जा रहा है। इंदौर के एमजीएम सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में 600 रूपये की पेड ओपीडी शुरू करने का निर्णय दरअसल उन गरीबों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है, जिनके लिए यह अस्पताल आखिरी उम्मीद था। मेडिकल टूरिज्म और अमीरों को आकर्षित करने के नाम पर तैयार की गई यह नीति स्पष्ट रूप से सरकारी स्वास्थ्य तंत्र के निजीकरण की ओर एक बड़ा इशारा है। :: इंसेंटिव का लालच : क्या अब केवल मलाईदार केस देखेंगे डॉक्टर? शासन ने सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को शासकीय सेवा में रोकने के लिए 3 लाख रूपये तक का भारी वेतन और इंसेंटिव का जो लालच दिया है, वह भविष्य में खतरनाक साबित हो सकता है। - कमीशन का खेल : ऑपरेशन से मिलने वाले रेवेन्यू का 20% और ओपीडी फीस का 50% सीधा डॉक्टरों की जेब में जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कमीशन कल्चर डॉक्टरों को गैर-जरूरी ऑपरेशंस की ओर धकेल सकता है। - अनदेखी का डर : जब डॉक्टरों को शाम की ओपीडी और ऑपरेशंस से मोटा कमीशन मिलेगा, तो क्या वे सुबह की मुफ्त ओपीडी में आने वाले गरीब मरीजों को पर्याप्त समय और संवेदनशीलता देंगे? :: 10 बनाम 600 रूपये : पैदा की जा रही है अमीरों की अलग कतार :: अस्पताल प्रशासन का तर्क है कि 600 रूपये की फीस भीड़ कम करने के लिए है। लेकिन वास्तविकता यह है कि एक ही छत के नीचे अमीर और गरीब की दो अलग श्रेणियां बनाई जा रही हैं। - संसाधनों का बँटवारा : सरकारी मशीनरी, बिजली और स्टाफ जनता के टैक्स के पैसे से चलते हैं। ऐसे में इन संसाधनों का उपयोग पेड ओपीडी के जरिए कमाई के लिए करना संवैधानिक नैतिकता पर सवाल खड़े करता है। - समय की चोरी : सुबह 9 से शाम 4 बजे तक के ड्यूटी समय के बाद डॉक्टरों की ऊर्जा इवनिंग राउंड और पेड ओपीडी पर केंद्रित रहेगी, जिससे भर्ती मरीजों की आपातकालीन देखभाल प्रभावित होना तय है। :: आम आदमी की पहुंच से बाहर सुपर स्पेशलिटी :: भले ही प्रशासन इसे निजी अस्पतालों से सस्ता बता रहा हो, लेकिन 500 रूपये दिहाड़ी कमाने वाले मजदूर के लिए 600 रूपये की ओपीडी फीस उसकी पहुंच से कोसों दूर है। मेडिकल टूरिज्म के नाम पर इंदौर को हब बनाने की होड़ में सरकार यह भूल रही है कि सरकारी अस्पतालों की प्राथमिकता राजस्व जुटाना नहीं, बल्कि अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को मुफ्त और श्रेष्ठ इलाज देना है। अस्पताल को कॉर्पोरेट लुक देने की यह सनक कहीं इसे आम आदमी के लिए पूरी तरह नो-एंट्री जोन न बना दे। प्रकाश/14 मार्च 2026