राष्ट्रीय
18-Mar-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। वात, पित्त और कफ तीनों दोष शरीर की विभिन्न शारीरिक और मानसिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। जैसे ही इनका संतुलन बिगड़ता है, कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं सामने आने लगती हैं। आयुर्वेद के अनुसार, हमारे खानपान का इन दोषों के संतुलन पर सीधा प्रभाव पड़ता है, इसलिए भोजन के स्वाद और प्रकृति को समझना बेहद जरूरी है। यह सिद्धांत प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद का एक महत्वपूर्ण आधार है। आयुर्वेद में भोजन के छह प्रमुख रस या स्वाद बताए गए हैं, जिनमें मधुर यानी मीठा, अम्ल यानी खट्टा, लवण यानी नमकीन, कटु यानी तीखा, तिक्त यानी कड़वा और कषाय यानी कसैला शामिल हैं। इन सभी रसों का शरीर के तीनों दोषों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है और इन्हीं के आधार पर शरीर में संतुलन या असंतुलन की स्थिति बनती है। वात दोष को बढ़ाने वाले स्वादों में मुख्य रूप से तीखा, कड़वा और कसैला रस शामिल होते हैं। यदि कोई व्यक्ति इन स्वादों का अत्यधिक सेवन करता है तो शरीर में वात बढ़ सकता है। इसके कारण गैस, शरीर में सूखापन, बेचैनी, कमजोरी या जोड़ों में दर्द जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। वात को संतुलित बनाए रखने के लिए मीठा, नमकीन और खट्टा स्वाद अधिक लाभकारी माना जाता है। इसके साथ ही हल्का गर्म और थोड़ा तैलीय भोजन वात को शांत करने में सहायक होता है। पित्त दोष का संबंध शरीर की गर्मी, पाचन क्रिया और चयापचय से माना जाता है। तीखा, खट्टा और नमकीन स्वाद पित्त को बढ़ाने वाले माने जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक मसालेदार या खट्टा भोजन करता है तो शरीर में गर्मी बढ़ सकती है, जिससे एसिडिटी, जलन, चिड़चिड़ापन और त्वचा से जुड़ी परेशानियां हो सकती हैं। पित्त को संतुलित करने के लिए मीठा, कड़वा और कसैला स्वाद उपयोगी माना जाता है। ठंडे और हल्के खाद्य पदार्थ जैसे हरी सब्जियां और ताजे फल पित्त को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं। कफ दोष शरीर की स्थिरता, ताकत और नमी से जुड़ा माना जाता है। मीठा, नमकीन और खट्टा स्वाद कफ को बढ़ाने का काम करते हैं। इनका अधिक सेवन करने से शरीर में भारीपन, सुस्ती, वजन बढ़ना और बलगम जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कफ को कम करने के लिए तीखा, कड़वा और कसैला स्वाद लाभकारी माना जाता है। हल्का, गर्म और थोड़ा मसालेदार भोजन कफ को संतुलित बनाए रखने में सहायक होता है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि व्यक्ति अपने शरीर की प्रकृति को समझकर भोजन का चयन करता है और छहों रसों का संतुलित सेवन करता है, तो वह लंबे समय तक स्वस्थ और ऊर्जावान रह सकता है। आयुर्वेद में संतुलित आहार को ही स्वस्थ जीवन की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी माना गया है। सुदामा/ईएमएस 18 मार्च 2026