(19 मार्च जन्म जयंती जिंद पीर झूलेलाल) भारतीय संस्कृति में अनेक ऐसे देव रूप हैं जो केवल आस्था के प्रतीक नहीं बल्कि संघर्ष, साहस और मानवता के संदेशवाहक भी हैं। सिंधी समाज के आराध्य भगवान झूलेलाल भी ऐसे ही दिव्य अवतार माने जाते हैं। उन्हें उदेरोलाल, लालसाईं, अमरलाल, जिंद पौर और लालशाह जैसे अनेक नामों से पूजा जाता है। सिंधी समाज में भगवान झूलेलाल को जल के देवता वरुण का अवतार माना जाता है। विशेष रूप से पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत और अन्य देशों में जाकर बसे सिंधी समुदाय के लोगों में झूलेलाल की भक्ति अत्यंत गहरी है। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं बल्कि अपने इतिहास, संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा का प्रतीक भी है। किंवदंतियों के अनुसार उस समय सिंध प्रांत पर मिरख शाह नामक एक कठोर मुस्लिम शासक का शासन था। उसने हिंदू समाज को दरबार में बुलाकर आदेश दिया कि वे या तो इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें या फिर मृत्यु के लिए तैयार हो जाएं। यह आदेश सुनकर हिंदू समाज भय और पीड़ा से भर उठा। उन्होंने राजा से इस आदेश पर विचार करने के लिए कुछ समय मांगा। मिरख शाह ने उन्हें चालीस दिनों का समय दिया। यह समय हिंदू समाज के लिए अत्यंत कठिन था क्योंकि उनके सामने अपने धर्म और अस्तित्व को बचाने का प्रश्न था। तब पूरे सिंध क्षेत्र के हिंदू सिंधु नदी के तट पर एकत्र हुए और जल के देवता वरुण से प्रार्थना करने लगे। उन्होंने व्रत, पूजा और तपस्या के माध्यम से चालीस दिनों तक भगवान से रक्षा की विनती की। कहा जाता है कि चालीसवें दिन उनकी प्रार्थना का उत्तर मिला। सिंधु नदी के तट पर एक दिव्य आकाशवाणी हुई और स्वयं वरुण देव मछली पर सवार होकर प्रकट हुए। उन्होंने भक्तों से कहा कि भयभीत मत हो, मैं अत्याचारियों का अंत करने के लिए शीघ्र ही मानव रूप में जन्म लूंगा। उन्होंने बताया कि नसीरपुर नगर में रतनराय के घर माता देवकी के गर्भ से उनका अवतार होगा और वे मिरख शाह के अत्याचारों से हिंदुओं को मुक्त करेंगे। सिंधी समाज इस चालीस दिनों की तपस्या को आज भी चालिहा या वालिहा के नाम से याद करता है। यह उनके धैर्य और विश्वास का प्रतीक है। इसके बाद पूरे समाज ने अपने मुक्तिदाता की प्रतीक्षा आरंभ कर दी। तीन महीने बाद समाचार मिला कि माता देवकी गर्भवती हैं। यह माना गया कि जल के देवता ने स्वयं उनके गर्भ में अवतार लिया है। चैत्र मास की द्वितीया तिथि को चेटीचंड के पावन दिन भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ। उस समय विक्रम संवत एक हजार सात चल रहा था। बालक का नाम उदयचंद रखा गया, परंतु माता देवकी स्नेह से उन्हें झूलेलाल कहकर पुकारती थीं। कथा के अनुसार जन्म के समय ही बालक उदयचंद ने चमत्कार दिखाना प्रारंभ कर दिया था। कहा जाता है कि जब उन्होंने अपना मुख खोला तो माता देवकी को उसमें सिंधु नदी बहती दिखाई दी और उस नदी में पाला मछली पर एक वृद्ध व्यक्ति बैठा हुआ था। पाला मछली को विशेष माना जाता है क्योंकि वह नदी की धारा के विपरीत तैरती है। यह संकेत था कि यह बालक साधारण नहीं बल्कि दिव्य शक्ति का अवतार है। जन्म के समय अचानक बादल घिर आए और वर्षा से पूरा क्षेत्र जलमय हो गया। लोगों ने इसे भी एक चमत्कार के रूप में देखा। जैसे-जैसे बालक उदयचंद बड़े होते गए, उनके चमत्कारों की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी। एक ज्योतिषी ने बालक को देखकर भविष्यवाणी की कि यह बालक अत्यंत वीर और तेजस्वी होगा तथा इसकी ख्याति पूरे संसार में फैलेगी। जब मिरख शाह को झूलेलाल के जन्म का समाचार मिला तो उसने फिर हिंदू नेताओं को दरबार में बुलाकर अपनी धमकी दोहराई। किंतु इस बार हिंदू समाज के चेहरे पर भय नहीं बल्कि आत्मविश्वास था। उन्हें विश्वास था कि उनका रक्षक जन्म ले चुका है। मिरख शाह ने बालक को पकड़ने के लिए अपने सेनापति अहिरियो को सैनिकों के साथ भेजा। जब सेनापति बालक के पास पहुंचा तो उसने देखा कि वह अत्यंत आकर्षक और तेजस्वी है। कहा जाता है कि बालक के सामने आते ही सेनापति चकित रह गया। उसी समय बालक ने अपना रूप बदलना शुरू किया। पहले वह वृद्ध साधु के रूप में दिखाई दिया, फिर एक बलवान युवक के रूप में घोड़े पर सवार तलवार लिए खड़ा दिखाई दिया। यह दृश्य देखकर सेनापति भयभीत हो गया और उसने बालक के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। उसने स्वीकार किया कि यह कोई साधारण बालक नहीं बल्कि दिव्य अवतार है। सेनापति ने वापस जाकर मिरख शाह को सब बताया, लेकिन बादशाह ने इसे स्वीकार नहीं किया और उसने एक बड़ी सेना भेज दी। तब झूलेलाल ने अपनी दिव्य शक्ति से बादशाह के महल को अग्नि से घेर लिया। जब महल में भयंकर आग लग गई तो मिरख शाह भयभीत होकर झूलेलाल के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा। कहा जाता है कि झूलेलाल की करुणा और शक्ति से प्रभावित होकर उसने अत्याचार छोड़ दिए और सभी धर्मों के प्रति सम्मान का मार्ग अपनाया। कथा के अनुसार बाद में उसने एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जो आज भी हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है। पाकिस्तान में झूलेलाल को जिंद पीर और लालशाह के नाम से भी सम्मान दिया जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि झूलेलाल केवल एक धर्म के देवता नहीं बल्कि मानवता और सद्भाव के संदेशवाहक हैं। आज भी सिंधी समाज भगवान झूलेलाल को उदेरोलाल, लालसाईं, अमरलाल और जिंद पौर जैसे कई नामों से श्रद्धा के साथ स्मरण करता है। हर वर्ष चैत्र मास में चंद्र दर्शन के दिन चेटीचंड का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है। यह दिन सिंधी समाज के लिए नववर्ष के समान भी माना जाता है। इस दिन लोग झूलेलाल की पूजा करते हैं और अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। चेटीचंड के अवसर पर लकड़ी का एक छोटा मंदिर बनाया जाता है जिसमें जल से भरी एक पात्र और प्रज्वलित ज्योति रखी जाती है। इसे बहिराणा साहब कहा जाता है। श्रद्धालु इसे अपने सिर पर उठाकर शोभायात्रा निकालते हैं और भगवान वरुण तथा झूलेलाल का स्तुतिगान करते हैं। इस अवसर पर सिंधी समाज का पारंपरिक नृत्य छैज भी किया जाता है जो उल्लास और भक्ति का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है। चेटीचंड का पर्व केवल धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक पर्व भी है। इस दिन सिंधी समाज अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत को याद करता है। यह पर्व समाज को एक सूत्र में बांधता है और लोगों के बीच भाईचारे की भावना को मजबूत करता है। इस दिन समाज के सभी वर्ग एक साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं और विभाजन की सभी रेखाएं मिट जाती हैं। भगवान झूलेलाल की कथा हमें यह संदेश देती है कि जब भी अन्याय और अत्याचार बढ़ते हैं तो धर्म और सत्य की रक्षा के लिए दिव्य शक्ति अवश्य प्रकट होती है। यह कथा विश्वास, धैर्य और एकता की शक्ति का प्रतीक है। सिंधी समाज के लिए झूलेलाल केवल देवता नहीं बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और इतिहास के जीवंत प्रतीक हैं। आज जब संसार में अनेक प्रकार के मतभेद और संघर्ष दिखाई देते हैं, तब झूलेलाल की कथा हमें सहिष्णुता और सद्भाव का मार्ग दिखाती है। उनका वजीवन यह सिखाता है कि सभी धर्मों का सम्मान करना ही सच्ची मानवता है। सिंधु की पवित्र धारा से जन्मी यह आस्था की ज्योति आज भी करोड़ों लोगों के जीवन को प्रकाश और आशा से भर रही है। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार)