राज्य
19-Mar-2026
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भोपाल (ईएमएस)। मध्य प्रदेश में शासकीय सेवाओं में आरक्षित वर्ग के नाम पर फर्जी जाति प्रमाणपत्र लगाकर नौकरी पाने वाले कई अफसर और कर्मचारी कार्रवाई से बचते नजर आ रहे हैं। कई मामलों में जांच समितियों ने जाति प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित कर दिया, लेकिन इसके बावजूद न तो संबंधित कर्मचारियों की नौकरी समाप्त की गई और न ही उनसे अब तक वेतन की वसूली हो सकी। इसकी मुख्य वजह सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) का एक प्रावधान बताया जा रहा है, जिसका लाभ हर साल दर्जनों अधिकारी-कर्मचारी उठा रहे हैं। दरअसल, सामान्य प्रशासन विभाग ने वर्ष 2018 में एक आदेश जारी किया था। इस आदेश के अनुसार धीवर, कहार, भंडारी, केवट, मछुआ, निषाद जैसी जातियों के वे लोग, जिन्होंने 11 नवंबर 2005 से पहले शासकीय सेवाओं में नियुक्ति प्राप्त की या शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश लिया, यदि बाद में उनका जाति प्रमाणपत्र अमान्य घोषित हो जाता है तो भी उन्हें सेवा से हटाने या वेतन की वसूली जैसी कठोर कार्रवाई से राहत मिल सकती है। यही कारण है कि फर्जी प्रमाणपत्र सामने आने के बाद भी कई मामलों में विभागीय कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है। सूत्रों के अनुसार पिछले एक वर्ष में ही ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें जांच के दौरान जाति प्रमाणपत्र फर्जी या अमान्य पाए गए। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी या कर्मचारी सेवा में बने हुए हैं। प्रशासनिक हलकों में इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब जांच में प्रमाणपत्र गलत साबित हो रहा है तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही। (केस नंबर - 1) एक मामले में पंचायत एवं समाज सेवा संचालनालय में कार्यरत एक कर्मचारी ने वर्ष 1983 में अनुसूचित जनजाति का प्रमाणपत्र लगाकर नौकरी प्राप्त की थी। शिकायत के बाद मामले की जांच हुई और प्रमाणपत्र अमान्य पाया गया। जांच में यह भी सामने आया कि संबंधित व्यक्ति उस जाति वर्ग में नहीं आता, जिसके आधार पर उसने नौकरी प्राप्त की थी। इसके बावजूद सामान्य प्रशासन विभाग के प्रावधान का हवाला देकर उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की जा सकी। (केस नंबर - 2) इसी तरह एक अन्य मामले में कपिलधारा योजना में पदस्थ एक कर्मचारी ने मांझी आदिवासी का प्रमाणपत्र लगाकर नौकरी हासिल की थी। शिकायत मिलने के बाद जांच कराई गई, जिसमें प्रमाणपत्र अमान्य पाया गया। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि संबंधित व्यक्ति उस जाति का नहीं है, लेकिन इसके बावजूद विभागीय कार्रवाई नहीं हो सकी। (केस नंबर - 3) एक अन्य मामले में फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी पाने वाले कर्मचारी की शिकायत जांच समिति तक पहुंची। पुलिस और प्रशासनिक जांच में प्रमाणपत्र संदिग्ध पाया गया, लेकिन जीएडी के आदेश के कारण मामला आगे नहीं बढ़ सका। नौकरी पाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के प्रावधान से उन लोगों को संरक्षण मिल रहा है, जिन्होंने गलत तरीके से आरक्षण का लाभ उठाकर नौकरी हासिल की है। इससे वास्तविक पात्र उम्मीदवारों के साथ अन्याय हो रहा है। कई अधिकारी मानते हैं कि यदि ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य में भी फर्जी प्रमाणपत्र लगाकर नौकरी पाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। फिलहाल राज्य सरकार की ओर से इस आदेश में किसी तरह के संशोधन या बदलाव के संकेत नहीं मिले हैं। ऐसे में जांच में फर्जी पाए गए जाति प्रमाणपत्रों के बावजूद कई अधिकारी-कर्मचारी सेवा में बने हुए हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।