नई दिल्ली (ईएमएस)। यह मामला जुलाई 1999 का है। आरोपी की पत्नी की शादी के सात साल के भीतर ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। उसने चाय में कोई जहरीला पदार्थ पी लिया था, जिससे उसकी जान चली गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि आज के समय में आत्महत्या सभ्य समाज की बढ़ती समस्या बनती जा रही है। कोर्ट के अनुसार बढ़ता तनाव, सामाजिक दबाव और परिवारिक सहयोग तंत्र के कमजोर होने की वजह से लोग इस चरम कदम की ओर बढ़ रहे हैं। यह टिप्पणी जस्टिस विमल कुमार यादव ने उस मामले की सुनवाई के दौरान की जिसमें एक व्यक्ति पर अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप था। यह मामला जुलाई 1999 का है। आरोपी की पत्नी की शादी के सात साल के भीतर ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। उसने चाय में कोई जहरीला पदार्थ पी लिया था, जिससे उसकी जान चली गई। मृतका के परिवार ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद से ही उस पर दहेज के लिए दबाव बनाया जा रहा था। आरोप था कि पति और ससुराल वालों ने पचास हजार की मांग की थी। जिसमें से लड़की के परिवार ने 30 हजार दे भी दिए थे। लेकिन बाकी रकम के लिए उसे लगातार परेशान किया जाता रहा। ट्रायल कोर्ट ने मृतका के माता-पिता और भाई की गवाही के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया था। उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए (क्रूरता) और धारा 304B (दहेज हत्या) के तहत दोषी मानते हुए सात साल की सख्त कैद की सजा सुनाई गई थी। मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर अदालत ने पूरे रिकॉर्ड और सबूतों की दोबारा जांच की। कोर्ट ने माना कि दहेज को लेकर महिला के साथ उत्पीड़न और क्रूरता के पर्याप्त सबूत हैं। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यह साबित करने के लिए पुख्ता सबूत नहीं हैं कि आरोपी ने ही उसकी हत्या की या सीधे तौर पर उसकी मौत का कारण बना। इसलिए दहेज हत्या (धारा 304 बी) का आरोप टिक नहीं पाया। कोर्ट ने मृतका के भाई द्वारा बताए गए कथित डाइंग डिक्लेरेशन यानी अंतिम बयान पर भी संदेह जताया। मेडिकल रिकॉर्ड में बताया गया था कि उस समय महिला बयान देने की स्थिति में नहीं थी, जिससे गवाही में विरोधाभास दिखाई दिया। अजीत झा/देवेन्द्र/नई दिल्ली/ ईएमएस/19/मार्च /2026