भारत में माओवाद, जिसे लंबे समय तक ‘लाल आतंक’ के रूप में जाना गया, अब अपने अंतिम दौर में दिखाई दे रहा है। पांच दशकों तक देश के अनेक हिस्सों में हिंसा, भय और अव्यवस्था का पर्याय बना यह आंदोलन आज सिकुड़कर कुछ गिने-चुने इलाकों तक सीमित रह गया है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे केंद्र और राज्य सरकारों की एक सुसंगत, बहुआयामी और समयबद्ध रणनीति का बड़ा योगदान है। विशेष रूप से 31 मार्च तक माओवाद के खात्मे की तय की गई डेडलाइन ने इस अभियान को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने माओवाद को समाप्त करने के लिए एक स्पष्ट समयसीमा घोषित की, तब कई विश्लेषकों ने इसे अत्यधिक महत्वाकांक्षी बताया था। लेकिन यही डेडलाइन सुरक्षा एजेंसियों के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित हुई। समयबद्ध लक्ष्य ने न केवल कार्यप्रणाली में तेजी लाई, बल्कि विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय भी स्थापित किया। पहले जहां अभियान बिखरे हुए और क्षेत्रीय स्तर पर सीमित रहते थे, वहीं अब एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ समन्वित कार्रवाई देखने को मिली। सरकार की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका बहुस्तरीय होना है। केवल सैन्य कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय, आधुनिक तकनीक, खुफिया तंत्र की मजबूती और विकास कार्यों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाया गया। इजरायली हेरॉन जैसे उन्नत यूएवी और स्वदेशी ड्रोन तकनीकों ने घने जंगलों में छिपे नक्सलियों की गतिविधियों पर ‘तीसरी आंख’ की तरह नजर रखी। एआई आधारित विश्लेषण, सैटेलाइट इमेजिंग और संचार ट्रैकिंग ने उन ठिकानों को भी उजागर कर दिया, जो पहले अभेद्य माने जाते थे। इस तकनीकी बढ़त ने नक्सलियों के पारंपरिक गुरिल्ला युद्ध को अप्रभावी बना दिया। इसके साथ ही सुरक्षा बलों की आक्रामक रणनीति ने भी निर्णायक भूमिका निभाई। पिछले कुछ वर्षों में लगातार चलाए गए अभियानों ने नक्सली नेतृत्व को गहरा झटका दिया है। शीर्ष कमांडरों के मारे जाने से संगठन की रीढ़ कमजोर हुई है। हाल ही में हुए बड़े अभियानों में कई कुख्यात नक्सली नेताओं का सफाया हुआ, जिससे संगठन का मनोबल बुरी तरह टूट गया। 2025 में शीर्ष स्तर के नेताओं के मारे जाने को इस संघर्ष का टर्निंग पॉइंट माना जा सकता है। इससे न केवल नेतृत्व का संकट उत्पन्न हुआ, बल्कि निचले स्तर के कैडर में भी भय और असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। हाल के महीनों में छत्तीसगढ़ और झारखंड के सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बलों द्वारा किए गए बड़े ऑपरेशनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार अब निर्णायक लड़ाई के मोड में है। कई मुठभेड़ों में नक्सलियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इन अभियानों की विशेषता यह रही कि इनमें खुफिया जानकारी का सटीक उपयोग किया गया, जिससे न्यूनतम नुकसान के साथ अधिकतम सफलता हासिल की गई। यह भी देखने में आया है कि अब नक्सली पहले की तरह संगठित होकर बड़े हमले करने में सक्षम नहीं रह गए हैं, बल्कि छोटे-छोटे समूहों में बंटकर बचाव की रणनीति अपना रहे हैं। सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। स्पष्ट संदेश दिया गया कि हिंसा और लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों के लिए कोई स्थान नहीं है। लेकिन इसके साथ ही सरकार ने एक मानवीय दृष्टिकोण भी अपनाया। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास के लिए योजनाएं चलाई गईं, जिससे बड़ी संख्या में कैडर मुख्यधारा में लौटे। हजारों की संख्या में गिरफ्तारियां और उससे भी अधिक आत्मसमर्पण इस बात का प्रमाण हैं कि संगठन का आधार तेजी से खत्म हो रहा है। माओवाद के कमजोर पड़ने का एक और बड़ा कारण उसका जनाधार खत्म होना है। जिन क्षेत्रों में कभी नक्सलियों का प्रभाव था, वहां अब सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाएं पहुंच रही हैं। विकास कार्यों ने स्थानीय लोगों के जीवन में बदलाव लाया है, जिससे वे हिंसक आंदोलन से दूर हो रहे हैं। पहले जहां नक्सली खुद को गरीबों और आदिवासियों का हितैषी बताते थे, वहीं अब उनकी वास्तविकता लोगों के सामने आ चुकी है। हिंसा और भय के जरिए समर्थन हासिल करने की उनकी रणनीति अब कारगर नहीं रही। 31 मार्च की डेडलाइन के संदर्भ में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह केवल एक प्रशासनिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी है। इस समयसीमा ने नक्सलियों के भीतर असुरक्षा और भय की भावना को बढ़ा दिया है। उन्हें यह एहसास हो गया है कि अब उनके पास बचने के विकल्प सीमित हैं। यही कारण है कि आत्मसमर्पण की घटनाओं में तेजी आई है। सरकार का यह प्रयास सराहनीय है कि वह शेष बचे नक्सलियों को भी हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में आने का अवसर दे रही है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि माओवाद का इतिहास केवल हिंसा का नहीं, बल्कि एक वैचारिक भ्रम का भी रहा है। 1967 में नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह आंदोलन समय के साथ अपने मूल उद्देश्यों से भटक गया। सामाजिक न्याय के नाम पर शुरू हुआ यह संघर्ष धीरे-धीरे सत्ता और नियंत्रण की लड़ाई बनकर रह गया। आज जब यह आंदोलन अपने अंत की ओर है, तो यह लोकतंत्र की शक्ति और लचीलेपन का भी प्रमाण है। सरकार की रणनीति की प्रशंसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उसने केवल समस्या को दबाने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसके मूल कारणों को समझकर समाधान खोजने का प्रयास किया। सुरक्षा, विकास और संवाद—इन तीनों स्तंभों पर आधारित नीति ने यह दिखाया कि जटिल समस्याओं का समाधान भी समग्र दृष्टिकोण से ही संभव है। यह मॉडल भविष्य में अन्य आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए भी मार्गदर्शक बन सकता है। अंततः यह कहा जा सकता है कि माओवाद का अंत केवल एक सुरक्षा उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। हालांकि पूरी तरह से समाप्ति की घोषणा तभी सार्थक होगी जब अंतिम बचे तत्व भी आत्मसमर्पण कर दें या निष्क्रिय हो जाएं, लेकिन वर्तमान स्थिति स्पष्ट संकेत देती है कि वह दिन अब दूर नहीं है। 31 मार्च की डेडलाइन ने जिस गति और दिशा को जन्म दिया है, वह निश्चित रूप से भारत को ‘लाल आतंक’ से मुक्त करने की दिशा में निर्णायक साबित होगी। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 24 मार्च /2026