लेख
24-Mar-2026
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25 मार्च को ‘‘जन्म दिवस’’ के अवसर पर विशेष) ‘‘डॉ. मोहन यादवः परस्पर शिक्षा और विकास के ‘‘संगम’’ का नेतृत्व’’। भूमिका मध्यप्रदेश के यशस्वी लोकप्रिय मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के जन्म दिवस के अवसर पर उन्हें शुभकामनाएं देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके कार्यो में उस पक्ष को भी समझना आवश्यक है, जिसने उन्हें मध्यप्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण सबसे विशिष्ट स्थान दिलाया है। इस अवसर पर उनके नेतृत्व और मध्यप्रदेश की राजनीति में उसके संभावित प्रभावों पर विचार करना प्रासंगिक है। ‘‘ व्यक्तित्व ।’’ मध्यप्रदेश की राजनीति पिछले दो दशकों में कई महत्वपूर्ण मोड़ों से गुजरी है। इन वर्षों में राज्य ने स्थिरता, विकास और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तीनों का अनुभव किया है। ऐसे परिदृश्य में डॉ. मोहन यादव का एक ‘‘गुबार-ए-कारवां से अमीर-ए-कारवां’’ की नजीर बन कर मुख्यमंत्री के रूप में उदय केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि नेतृत्व की नई पीढ़ी के उभार का भी संकेत माना जा सकता है। डॉ. मोहन यादव का व्यक्तित्व शिक्षा, संस्कृति और जनसेवा के समन्वय का प्रतीक है। वे केवल एक राजनेता ही नहीं, बल्कि एक शिक्षाविद और विचारशील व्यक्तित्व के रूप में भी जाने जाते हैं। राजनीति में उनका प्रवेश सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और राज्य के विकास का एक साधन रहा है। मोहन की कार्यप्रणाली व कर्मणता व सीधे कार्यकर्ताओं तक पहुंच से एक जुमला बन गया। ‘‘दरबार तक पहुंच हो तो दरबारी की क्या बिसात’’। ‘‘ नेतृत्व परिवर्तन का राजनीतिक संदर्भ।’ ’ लंबे समय तक शिवराज सिंह चौहान ‘‘मामा’’ मध्य प्रदेश की राजनीति के केंद्र बिंदु रहे। उनके कार्यकाल में कई जनकल्याणकारी योजनाएँ और विकास परियोजनाएँ प्रारंभ हुईं, जिन्होंने राज्य की राजनीति को एक स्थिर व विकास की दिशा दी। ऐसी परिस्थिति में स्थापित नेता शिवराज सिंह की जगह डॉ. मोहन यादव की केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा स्थापना एक दूरदर्शी निर्णय था, जो खतरे से खाली नहीं था। परन्तु जैसे कि ‘‘एक तिनके से हवा का रुख पता चल जाता है’’, मोहन ने उन ख़तरे के बादल की आशंकाओं को शीघ्र ही अभी तक की अपनी कार्यप्रणाली से निर्मूल कर दिया। लोकतंत्र में नेतृत्व परिवर्तन केवल ‘‘व्यक्तियों का परिवर्तन’’ नहीं होता, बल्कि वह राजनीति की दिशा, प्राथमिकताओं और कार्यशैली में संभावित बदलाव का संकेत भी होता है। ऐसी स्थिति में जब किसी लंबे समय तक प्रभावशाली नेता के बाद नया नेतृत्व सामने आता है, तो स्वाभाविक रूप से तुलना और अपेक्षाएँ दोनों बढ़ जाती हैं। डॉ. मोहन यादव के सामने भी यही परिस्थिति है। उन्हें ‘‘अच्छा बोओ अच्छा काटो’’ की नीति पर चलते हुए और एक स्थापित राजनीतिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी अलग पहचान भी बनानी है। इसमें वे सफल होते दिख भी रहे हैं। ‘ ‘संगठनात्मक राजनीति से प्रशासनिक नेतृत्व तक।’’ ‘‘संघे शक्तिः कलौ युगे’’ के सूत्र वाक्य को अपने जीवन में उतारने वाले डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक पृष्ठभूमि मूलतः संगठनात्मक राजनीति से जुड़ी रही है। वे जानते हैं कि ‘‘एक फूल से माला नहीं बनती’’। भाजपा के संगठनात्मक ढाँचे में कार्य करते हुए उन्होंने छात्र राजनीति से लेकर राज्य स्तर तक अपनी सक्रियता बनाए रखी। संगठनात्मक राजनीति की यह पृष्ठभूमि प्रशासनिक नेतृत्व में भी सहायक हो सकती है, क्योंकि इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में सामूहिकता और संगठनात्मक संतुलन बनाए रखने की क्षमता विकसित होती है। ‘‘ संस्कृति, पहचान और विकास की राजनीति ’’। डॉ. मोहन यादव का जुड़ाव महाकाल की नगरी ‘‘उज्जयनी’’ से रहा है, जो भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यह सांस्कृतिक पृष्ठभूमि उनके राजनीतिक विचारों और प्राथमिकताओं में ‘‘चोली दामन के साथ’’ की तरह दिखाई देती है। ‘‘ नेतृत्व की कसौटी ’’। लोकतंत्र में किसी भी नेता का अंतिम मूल्यांकन समय के साथ ही होता है। बगैर ‘‘जमीन आसमान के कुलाबे मिलाए’’, नीतियों की सफलता, विकास की गति और जनता के जीवन में होने वाले वास्तविक परिवर्तन ही यह तय करते हैं कि किसी नेता का योगदान कितना प्रभावशाली रहा। डॉ. मोहन यादव के सामने भी यही कसौटी होगी। यदि वे विकास, प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक संतुलन के बीच सही तालमेल स्थापित कर पाते हैं, जिसका वे प्रयास कर रहे है तो उनका कार्यकाल मध्यप्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो सकता है। ‘‘मध्यप्रदेशः चुनौतियां और अवसर।’’ भारत का ‘‘हृदय प्रदेश’’ कहलाने वाला विशाल राज्य, ‘‘मध्यप्रदेश’’ देश के उन राज्यों में से है, जहाँ विकास की संभावनाएँ अत्यंत व्यापक हैं, किंतु चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं, इन संभावनाओं को जमीन पर उतारना ‘‘हथेली पर सरसों जमाने जैसा’’ नहीं है। राज्य की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, जबकि उद्योग, पर्यटन और सेवा क्षेत्र में अभी भी विस्तार की पर्याप्त संभावनाएँ मौजूद हैं। कृषि उत्पादन बढ़ाना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना, औद्योगिक निवेश आकर्षित करना और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर राज्य सरकार की नीतियाँ निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। ‘‘ मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्रमुख उपलब्धियां (2023-2026) ।’’ औद्योगिक और इंफ्रास्ट्रक्चर विकासः इंदौर की वर्षों से लंबित हुकुमचंद मिल का मामला सुलझाया और सागर में खाद कारखाना चालू किया। सिंहस्थः वर्ष 2028 में क्षिप्रा जल से स्नान 2028 होगा। जल संरक्षण और कृषिः ‘‘जल पुरुष’’ के रूप में, उन्होंने हर खेत तक पानी पहुँचाने का संकल्प लिया है, जिसमें उज्जैन संभाग ने श्हर घर जलश् का लक्ष्य हासिल किया। 2026 को किसान कल्याण वर्ष घोषित किया। स्वालम्बीः गौ-शाला नीति 2025 स्वीकृति की। ’ प्रशासनिक सुधा रः ‘‘संकल्प से समाधान’’ अभियान के माध्यम से लंबित शिकायतों का त्वरित निवारण, और कलेक्टर्स को परफॉर्मेंस आधारित कार्य करने के कड़े निर्देश दिए। ‘‘साइबर तहसील’’ लागू करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य बना। धार्मिक और सांस्कृतिक विकासः ‘‘महाकाल लोक’’ के बाद उज्जैन और अन्य धार्मिक स्थलों का विकास। पर्यटनः रातापानी व माधव नेशनल पार्क की स्थापना की। पीएम ‘‘श्री हेली पर्यटन’’ एवं ‘‘वायु सेवा’’ की शुरूवात की। नक्सलवाद से मुक्ति: नक्सलवाद पुरी तरह से समाप्त कर दिया गया। मोहन यादव की अनुल्लंघनीय सदाचार की कार्यशैली ‘‘धन बल जन बल बुद्धि अपार, सदाचार बिन सब बेकार’’ से पूर्णतः सफल होता हुआ सही दिख रही है और ‘‘चुनने’’ की ‘‘पर्ची प्रक्रिया’’ पर आक्षेप लगाते हुए ‘‘उल्टी माला फेरने वालों’’ के ‘‘मुंह में दही जम गया’’ सा लगता हैं। ‘‘ मिथक को तोड़ा ’ ’। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिसंबर 2023 में इस लंबे समय से चली आ रही मान्यता या भ्रम (मिथक) को तोड़ा था। उज्जैन, जो महाकाल की नगरी है, को लेकर सदियों पुरानी (कुछ रिपोर्टों में 211 साल पुरानी बताई जाती है) यह धारणा प्रचलित थी कि कोई भी राजा, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या समकक्ष उच्च पदाधिकारी यहां रात्रि विश्राम (रात गुजारना) नहीं करता। ऐसा माना जाता था कि उज्जैन का असली राजा बाबा महाकाल (महाकालेश्वर) ही हैं, इसलिए कोई अन्य ‘‘राजा’’ यहां रात नहीं रुक सकता-वरना अशुभ या कुर्सी/सत्ता पर खतरा हो सकता है। मुख्यमंत्री मोहन यादव, जो खुद उज्जैन दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं, उज्जैन के निवासी हैं, ने मुख्यमंत्री बनने के बाद (13 दिसंबर 2023 को शपथ के कुछ दिन बाद) 16-17 दिसंबर 2023 की रात अपने उज्जैन स्थित घर में रात्रि विश्राम किया। इससे उन्होंने इस मिथक को स्पष्ट रूप से तोड़ा, और साबित किया कि ‘‘अंधविश्वास कमजोर व्यक्ति का धर्म है’’। उनका कहना है ‘‘राजा तो महाकाल हैं, हम तो उनके बेटे हैं’’। और अंत में ......। ‘‘सार्वजनिक व्यक्ति’’ के ‘‘जन्म दिवस’’ केवल ‘‘व्यक्तिगत उत्सव’’ नहीं होते हैं, बल्कि वे नए संकल्पों और जिम्मेदारियों को पुनः स्मरण करने का अवसर भी होते हैं। डॉ. मोहन यादव के जन्मदिन पर यही अपेक्षा की जा सकती है कि उनका नेतृत्व ‘‘परोपकाराय सतां विभूतयरू’’ की नीति पर चलते हुए मध्य प्रदेश को विकास, सुशासन और सामाजिक समरसता की नई ऊंचाइयों तक पहुँचाने में सफल होगा। जन्मदिन पर उन्हें पुनः हार्दिक शुभकामनाएँ। (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास) .../ 25 मार्च /2026