शुतुरमुर्ग एक जमीन पर तेज दौड़ने वाला पक्षी है। वो उड़ नहीं पाता लेकिन उसकी टांगें लंबी होती हैं। जब उसे कोई खतरा महसूस होता है तो वो भागकर कहीं अपना सर रेत में छुपा लेता है। चूंकि अब उसे कुछ नहीं दिखाई देता तो वह यह सोचकर खुश होता है कि उसके शिकारी को भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा। कुछ इसी तरह भारत के उच्च पदस्थ कर्ता-धर्ता भी रेत में सर गड़ाए हुए हैं। हमारे सिस्टम की गन्दगी आम आदमी का दम घोंट रही है मगर उसकी बात करना गुनाह है। हाल में एनसीआरटी की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नामक चैप्टर पर लगातार जारी शोरगुल ने फिर एक बार साबित कर दिया है कि हम असलियत पर पर्दा डालकर जीना पसंद करते हैं भले ही इस खुशफहमी के चलते अपने ही बोझ से एक दिन सारा सिस्टम ध्वस्त हो जाए। देश के नागरिक भली भांति जानते हैं कि सरकारी तंत्र में कितना भ्रष्टाचार व्याप्त है क्योंकि कभी न कभी हर किसी को ऐसा कुछ काम पड़ जाता है कि या तो उस व्यक्ति को बार बार दफ्तरों के चक्कर लगाना पड़ते हैं या फिर कुछ लेन-देन के बाद मामला सैटल होता है। चाहे कचहरी हो, आरटीओ हो, पेंशन ऑफिस हो, नगर निगम हो, थाना हो या सचिवालय! हर जगह सैटिंग कराने वाले दलाल सक्रिय हैं जो परेशान नागरिक की मुश्किल आसान करने में माहिर हैं। अदालतें भी इससे अछूती नहीं क्योंकि कई बार रिटायर्ड न्यायाधीश यह तकलीफ जाहिर कर चुके हैं कि अदालतों में भी भ्रष्टाचार फैला हुआ है। लेकिन हम इसे न तो छापेंगे और न ही स्वीकार करेंगे क्योंकि इससे देश की छवि बिगड़ने का खतरा है। दूसरा खतरा यह भी है कि छात्रों के मन पर खराब प्रभाव पड़ेगा। अजीब सोच है जो बीमारी को छिपाकर मरीज को स्वस्थ करना चाहती है। क्या इस बात पर भी कोई विचार होना चाहिए कि छात्र के जिस भोले मन को सच्चाई की कड़वी घुट्टी से बचाया जा रहा है वहीं भोला मन जब जिन्दगी के धक्कों के बीच भ्रष्टाचार की असलियत का सामना करेगा तब क्या होगा? तब उसे देश पर शर्म तो जरूर आएगी। अगर सक्षम हुआ तो भ्रष्टाचार की वैतरणी में पार उतर जाएगा और लाचार हुआ तो क्रोध और कुंठा के समन्दर में डूब जाएगा। हैरानी की बात है कि हम भ्रष्टाचार की सच्चाई को उजागर करने से इतना क्यों डरते हैं। अगर किसी बुराई को स्वीकार ही नहीं किया जाएगा तो उसे दूर करने की कोई कोशिश ही नहीं होगी। अगर बच्चों को सामाजिक बुराईयों के बारे में पढ़ाया जा सकता है कि झूठ बोलना पाप है या किसी को चोट पहुंचाना अपराध है तो फिर सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार के विषय में पढ़ाने में क्या समस्या है। फिर तो ये भी कहा जा सकता है कि बालक मन पर इस जानकारी का बुरा प्रभाव पड़ेगा कि लोग झूठ भी बोलते हैं और दूसरों को चोट भी पहुंचाते हैं। अगर बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करना है तो हर वास्तविकता से परिचय करवाना और हर मुश्किल से आगाह करना किसी भी पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। लेकिन हम भारतीय छिपाने में माहिर हैं। बढ़ते अपराध हों, दहेज प्रथा हो, बलात्कार हो, भ्रष्टाचार हो, हम उसे कड़े कानून के जरिए रोकना चाहते हैं लेकिन सामाजिक स्तर पर कोई प्रयास नहीं करते। और कानून इतना लचर है (यही विवादित पाठ का विषय है) कि अपराधी आखिरकार बच निकलता है। और अगर कोई धनाढ्य है तो कानून उसकी मुट्ठी में समझो। राजनीति, फिल्म, व्यापार, उद्योग और नौकरशाही से जुड़ी बड़ी बड़ी हस्तियों के मामले मीडिया में तो जोरशोर से उछलते हैं लेकिन बाद में पता भी नहीं चलता कि कौन कैसे बाइज्जत बरी हो गया। और अगर ऐसा न भी हो तो जमानत पर छूटकर केस को सालों तक पेंडिंग रखना भी मुमकिन है। बहुत से न्यायाधीश रिटायर होने के बाद स्वीकार भी करते हैं कि न्याय व्यवस्था में विलम्ब बहुत है और गरीब के लिए न्याय पाना बेहद कठिन है। ऐसे में समाज के लिए बेहतर यही होगा कि स्कूली पाठ्यक्रम के जरिए ही छात्रों को विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका सहित सिस्टम की सभी कमियों और कमजोरियों से वाकिफ करवाया जाए। वैसे भी शिक्षा सिर्फ विज्ञान, कला, वाणिज्य के सिद्धांतों तक सीमित नहीं होना चाहिये। अगर देश को अच्छे नागरिक तैयार करना है तो उन्हें सिस्टम की वो हक़ीक़त बताना भी जरूरी है जो दीमक की तरह धीरे धीरे पूरे समाज को नष्ट करती जा रही है। सिर्फ न्यायपालिका ही क्यों बल्कि कार्यपालिका और विधायिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी चर्चा उतनी ही आवश्यक है। दरअसल किसी न किसी मौके पर एक आम नागरिक का सामना सिस्टम से होता ही है। तब पता चलता है कि हम लेट-लतीफी, रिश्वतखोरी, कामचोरी और मक्कारी के कैसे कठिन दौर में हैं। कृश्न चंदर, हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल और शरद जोशी जैसे साहित्यकार सिस्टम की कमजोरियां पहले ही व्यंग्य के रूप में बता चुके हैं लेकिन अब इन्हें वास्तविक और गंभीर रूप में पढ़ाया जाना जरूरी है। अगर बीमारी का चर्चा नहीं होगा तो इलाज भी नामुमकिन है। ईएमएस/25/03/2026