- जनवरी-फरवरी में नौ दवाएं और एक ब्लड ग्रुपिंग किट मिली अमानक भोपाल (ईएमएस)। मप्र में एक तरफ सरकारी अस्पतालों को हाईटेक बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अस्पतालों में मरीजों को अमानक दवाएं दी जा रही हैं। आलम यह है कि सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाली दवाओं की जांच रिपोर्ट जब तक आती है, तब तक मरीजों में दवाएं बंट जाती हैं। कई बार स्थिति यह सामने आई है कि कोई दवा अमानक निकली है, उससे पहले मरीज उसका सेवन कर चुके होते हैं। अगर पिछले दो माह यानी जनवरी-फरवरी की बात करें तो नौ दवाएं और एक ब्लड ग्रुपिंग किट अमानक मिल चुकी हैं। बड़ी बात यह है कि इनमें छह एंटीबायोटिक हैं, जो संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए उपयोगी हैं। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के शासकीय अस्पतालों में रोगियों को बांटी जाने वाली दवाओं के लिए राज्य पब्लिक हेल्थ सप्लाई कारपोरेशन दवाओं की खरीदी के लिए कंपनियों से अनुबंध करता है। खरीदी आदेश जिले अपनी आवश्यकता के अनुसार जारी करते हैं। दवा आपूर्ति करने वाली कंपनी तैयार दवाएं, उपकरण या अन्य उत्पाद की जांच सबसे पहले खुद की लैब में करती है, जो ड्रग एवं कॉस्मेटिक एक्ट के अंतर्गत आवश्यक शर्त है। दूसरी जांच कंपनी को अन्य नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर लैबोरेट्री (एनएबीएल) मान्यता प्राप्त लैब से करानी होती है। दोनों मानक रिपोर्ट के साथ दवा की आपूर्ति की जाती है। रिपोर्ट अमानक होने पर सॉफ्टवेयर में दवा की प्राप्ति ही अंकित नहीं होती। इसके बाद दवाएं वितरण के लिए उपलब्ध कराई जाती हैं। तीसरी जांच वह अस्पताल कराता है, जहां उस दवा का पहला बैच गया है। दवा अमानक मिलती है तो तुरंत सभी जगह उसकी सूचना भेजी जाती है। ये नौ दवाएं निकली अमानक इसे लापरवाही ही कहेंगे की चार स्तर पर जांच के बाद भी दवाएं अमान निकल रही हैं। जो 9 दवाएं अमानक निकली हैं उनमें इट्राकोनाजोल कैप्सूल - फंगल रोधी, सेफेक्सिम सीरप - एंटीबायोटिक, अमिकासिन इंजेक्शन - एंटीबायोटिक, सिप्रोफ्लाक्सासिन टैबलेट - एंटीबायोटिक, मेरोपेनम इंजेक्शन - एंटीबायोटिक, सेफेक्सिम टैबलेट - एंटीबायोटिक, ईथमसाइलेट टैबलेट - ब्लीडिंग रोकने के लिए, पैरासिटामोल टैबलेट - बुखार के लिए, पायरोक्सीकैम टैबलेट - सूजन में उपयोगी और ब्लड ग्रुपिंग किट - ब्लड ग्रुप की जांच के लिए शामिल हैं। एमडी, मप्र पब्लिक हेल्थ सप्लाई कॉरपोरेशन मयंक अग्रवाल का कहना है कि चार स्तर पर दवाओं की जांच होती है। दो मानक रिपोर्ट मिलने पर ही दवा रिसीव की जाती है। कई बार रखरखाव और परिवहन के कारण गुणवत्ता में मामूली प्रभाव पड़ जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए संभाग स्तर पर वेयरहाउस बनाए जा रहे हैं। अन्य व्यवस्थाएं भी की जा रही हैं। चार बा होती है जांच प्रदेश में दवाओं की चार बार जांच होगी है। निजी लैबों में तीन बार की जांच में जो दवाएं गुणवत्ता में सही मिलती हैं, वे चौथी बार राज्य या केंद्र सरकार की लैब में अमानक निकल रही हैं। कार्रवाई के नाम पर दवा कंपनियों को मात्र दो वर्ष के लिए उस दवा की आपूर्ति के लिए प्रतिबंधित कर दिया जाता है। किसी दवा के तीन बैच या उस कंपनी के तीन उत्पाद अमानक मिलते हैं, तभी कंपनी को ब्लैक लिस्ट किया जाता है। कई बार ऐसी स्थिति भी आती है कि संबंधित बैच की आधे से अधिक दवाएं बंट जाने के बाद गुणवत्ता रिपोर्ट अमानक आती है, तब दवाओं के वितरण पर रोक लगाई जाती है। इसके साथ ही कंपनी से उस बैच की दवा खरीदी के लिए भुगतान की गई राशि वापस ली जाती है। उल्लेखनीय है कि मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध अस्पतालों से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) तक रोगियों को ओपीडी में और भर्ती होने पर दवाएं नि:शुल्क दी जाती हैं। अलग-अलग मद से दवाओं की खरीदी की जाती है। अकेले ओपीडी में प्रतिवर्ष लगभग सात करोड़ रोगियों को दवाएं दी जाती हैं। इसके बाद भी औचक तौर पर कुछ दवाओं के सैंपल सीएमएचओ या सिविल सर्जन के स्टोर से केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला कोलकाता या मध्य प्रदेश खाद्य एवं औषधि प्रशासन की लैब में भेजे जाते हैं। पहली तीन लैबों में मानक मिली दवाएं कोलकाता या राज्य सरकार की लैब में अमानक मिल रही हैं। इसके पीछे स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का तर्क है कि कई बार रखरखाव और परिवहन के चलते भी गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिसमें सुधार कर रहे हैं। विनोद / 25 मार्च 26