लेख
26-Mar-2026
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दूध हो या सब्जियां या फिर खाद्यान्न लोगों की सेहत के साथ हो रहा खिलवाड़ अब किसी से ढका छुपा नहीं है हाल की घटनाओं से यह बात भी सामने आ चुकी है कि नामी-गिरामी कंपनियां भी इस गोरखधंधे में बिना किसी हिचकिचाहट के शामिल है ,हैरानी की बात यह है कि इतना सब कुछ जग जाहिर होने के बाद हम अभी तक कोई ऐसा तंत्र विकसित नहीं कर पाए जिससे बच्चे से लेकर बूढ़े तक के स्वास्थ्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को रोका जा सके, निगरानी का अभाव और लाचार कानून मिलावटखोरों को सींकचों पीछे जाने से रोक रहे हैं । हरित क्रांति का मकसद देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाना है । इस दिशा में देश को अभूतपूर्व सफलता भी मिली लेकिन कब जहरीले पंजों ने खेती किसानी में घुसपैठ कर ली,पता नहीं चला हद तो तब हो गई जब जानबूझकर प्रदेश सरकारे इस ओर आंखें मूंदे रहीँ हैरानी इस बात की है। इस गंभीर मामले को अभी तक हमारे राजनीतिक दल अपनी नीतियों का हिस्सा नहीं बना पाए मुनाफा कमाने की अंधी दौड़ ने किसानों को भी परंपरागत खेती से पीछे छोड़ दिया और बढ़ती आबादी की जरूरत और मुनाफाखोरी की हवस ने मिलावट खोरी की जड़े गहरी कर दी पिछले तीन दशकों में खेती-किसानी में आए बदलाव ने उत्पादन को बढ़ाया लेकिन इस बदलाव के भयानक दुष्परिणामों पर ध्यान नहीं दिया गया। बैल और मवेशियों की जगह अब ट्रैक्टर और दूसरे आधुनिकतम यंत्रों ने ले ली है । लिहाजा गोबर और घूरे की राख से बनी कंपोस्ट खाद अब खेतों में दिखाई नहीं देतीं। फसल कटाई के पश्चात उसके रखरखाव में कीटनाशकों का जमकर उपयोग हो रहा है। जो स्वास्थ्य के लिए तो हानिकारक है ही आसपास के वातावरण को भी दूषित कर रहा है। कड़वा सच तो यह है कि आज खतरा सिर्फ रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से ही नहीं है बल्कि खाद्य पदार्थों में जिस तरह मिलावट खोरी का कारोबार तेजी से पनप रहा है वह मानवीय स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है । टमाटर गोभी और मूली, पालक जैसी सब्जियां पहले सिर्फ जाड़े के मौसम में ही बिकती थी। लेकिन अब वे मौसमी सब्जियां बारहों महीने धडल्ले से बिकने लगी हैं। महानगरों में इन सब्जियों की मांग अधिक है। क्योंकि अब लोगों के खानपान की शैली में तेजी से बदलाव आ रहा है। नई आर्थिक नीति के पश्चात देश में शहरी करण का तेजी के साथ विस्तार हुआ है। दिलचस्प तथ्य यह है कि शहरों में रह रहे लोगों की आमदनी बढ़ने का असर लोगों के रहन-सहन और खान-पान पर भी पड़ा है । वहीं यह कड़वा सच है बेमौसम फल और सब्जियां खाने की ललक ने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को बेहद बढ़ावा दिया है । यहां ध्यान देने की बात यह है कि वेमौसमी फल और सब्जियों को उगाने में उर्वरक और कीटनाशक ज्यादा लगता है। यह तथ्य भी काफी दिलचस्प है कि दूध ,दही, पनीर फल और अनाज में भी आजकल जमकर मिलावट हो रही है। इस मामले में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि मांसाहार हो या शाकाहार ऐसा कोई खाद्य पदार्थ नहीं है जो विषैले कीटनाशक और मिलावट से रहित हो बाजार में उपलब्ध आम , केला और पपीता जैसे फलों को कैल्शियम कार्बाइड की मदद से पकाया जाता है । खाद्य वस्तुओं में विषैले रसायनों के अतिरिक्त कई दूसरे किस्म की खतरनाक चीजों की मिलावट को चिकित्सक स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक मानते हैं। सूत्रों का कहना है कि फलों को चमकाने के लिए उन पर वेक्स भी लगाया जाता है । चिकित्सकों के मुताबिक वैक्स युक्त फलों का सेवन करने से डायरिया और कैंसर जैसी बीमारियां होती हैं। कृषि उत्पादों विशेषकर सब्जियों और डेयरी में ऑक्सीटॉसिन का बेहिचक होकर उपयोग हो रहा है। हैरानी इस बात पर है कि ऑक्सीटॉक्सिन का गलत ढंग से इस्तेमाल न हो इसलिए सरकार ने इसकी खुली बिक्री पर पाबंदी लगा रखी है । इसके बावजूद हिंदुस्तान भर में ऑक्सीटोक्सिन का उपयोग दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। गौरतलब है कि खाद्य वस्तुओं में मिलावट रोकने के लिए खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम 1954 और प्रिवेशन आफ फूड एडल्टरेशन एक्ट 1955 बनाया गया है । लेकिन इस एक्ट का ईमानदारी के साथ पालन नहीं हो रहा है। इन सब के बावजूद त्योहारों , शादी के सीजन में देश के प्रथक प्रथक भागों में कुंतल नकली मावा, पनीर, क्रीम,जप्त किया जाता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने कुछ माह पूर्व कृत्रिम और मिलावटी दूध के गोरखधंधे का खुलासा किया था। मध्यप्रदेश में दूध की गुणवत्ता परखने के लिए भेजे गए हैपलोग्रुप के परिणाम बताते हैं कि पिछले तीन सालों में औसतन 13-16 फीसदी सैपल अचानक पाये गये। प्राधिकरण ने अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करते हुए बताया था कि देश में बिकने वाला 68.5 प्रतिशत दूध मिलावटी है । अभी हाल ही में आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में मिलावटी दूध के सेवन से 16 लोगो की मौत हो गई,जबकि तीन लोग गभीर रुप से बीमार है।दूध में मिलावट के कारण हुई मौतों के पीछे दूध में एथिलीन ग्लाइकोल नाम का जहरीला पदार्थ मिलाया जाना वताया जा रहा है।खुले बाजार में उपलब्ध पीसे हरे धनिया का चटक हरा रंग देख कर ग्राहक आकर्षित होता है । लेकिन इस सच्चाई को जाने बगैर कि इसमें रंग धान की भूसी और घोड़े की लीद मिली हुई है। ऐसे मिलावटी धनिए को उपयोग में लेने से लीवर किडनी और तिल्ली काफी प्रभावित होती है इसी तरह आटे में भी तमाम सारी चीजों की मिलावट की जाती है। तुअर और चने की दालों में भी खेसारी मटर बटरे की मिलावट की जाती है । ग्राहकों को हानिकारक तत्वों की मिलावट का पता न चले इसलिए बड़े ही सुनियोजित ढंग से दालों पर पोलिस की जाती है। खेसारी दाल में एक खास तरह का रसायन पाया जाता है । इस दाल के इस्तेमाल से स्नायु तंत्र और गठिया से जुड़ी बीमारियां होती हैं। खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या पर विराम तभी लग सकता है । जब दिखावटी कागजी कार्यवाही बंद हो और मिलावट के गोरखधंधे में शामिल आरोपियों कि मामले की जांच पूरी होने से पूर्व जमानत न हो । अक्सर यह देखने में आता है कि जमानत मिलते ही आरोपी साक्ष्य और सबूतों को नष्ट करने में जुट जाता है। महानगरों में एक सप्ताह पुरानी मछलियों को बर्फ में रखा जाता है मछलियों को ताजा दिखाने के लिए उन पर तमाम तरह के पेस्टिसाइड्स छिड़के जाते हैं। तमाम दुकानदार फिल्टर पानी से भरे होद में सिंघी, भांगूर, रोहू, कवई, नस्ल की जिंदा मछलियां रखते हैं। पड़ताल में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं सच्चाई यह है कि इन जिंदा मछलियों को वक्त से पहले तैयार करने और वजनी बनाने के लिए तमाम सारी प्रतिबंधित दबाओ का उपयोग किया जाता है। अभी दिलचस्प यह है कि जानकारी के अभाव में ग्राहक दुकानदार से ऐसी मछलियों की खरीद-फरोख्त कर लेते हैं जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं। ईएमएस/26/03/2026