हिंदी पत्रकारिता के द्विशताब्दी वर्ष में हमें यह विचार करना होगा कि दो सौ साल पहले हमारे पूर्वजों ने किस तरह पत्रकारिता की थी, जो स्वतंत्रता आंदोलन में आम लोगों के मन में चेतना जगा गई। इस अवसर पर हमें भारत की चेतना यात्रा का अवलोकन करते हुए भविष्य का पथ भी तय करना होगा। आज फेक न्यूज का दौर है,ऐसे समय में पत्रकारिता के सामने नई तरह की चुनौतियां हैं। समाज हमेशा सच पर ही विश्वास करता है,ऐसे में पत्रकारों की जिम्मेदारी है कि वे समाज हित को केंद्र में रखकर ही लिखें।यह बात किसी आम व्यक्ति ने नही बल्कि मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने सप्रे संग्रहालय द्वारा आयोजित हिंदी पत्रकारिता द्विशताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए कही है। राज्यपाल 25 मार्च को माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान में ‘हिंदी पत्रकारिता की द्वि-शताब्दी’ पर आयोजित समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।उन्होंने कहा कि पत्रकारों का यह दायित्व है कि वे समाज के सामने ऐसा परोसें कि आने वाली पीढ़ी भ्रमित न हो,बल्कि पत्रकारिता पर भरोसा रखे।उन्होंने विश्वास जताया कि इस संदर्भ में होने वाली चर्चाओं से निकले निष्कर्ष समाज को नई दिशा देंगे।ज्ञानतीर्थ सप्रे संग्रहालय की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि विगत पांच वर्षों में पांचवीं बार यहां आया हूं, और हर बार यहां आकर आत्मिक संतोष मिलता है।वही अध्यक्षीय उद्बोधन में बरकतउल्ला विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. एसके जैन ने कहा कि एक समय था, जब पत्रकारों की कलम में समाज को नई दिशा देने की क्षमता होती थी,लेकिन समय के साथ बहुत बदलाव आये हैं। उन्होंने कहा कि पहले जो लिखा जाता था उसमें दिल की गहराई होती थी। आज चैट, जीपीटी और एआई का युग है, ऐसे में मौलिक लेखन प्रभावित हुआ है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजयमनोहर तिवारी ने कहा कि हिंदी के पहले समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तंड’ का मूल मंत्र ही था-‘हिंदुस्तानियों के हित का हेत’। लेकिन दो दशक की पत्रकारिता में हम इस मूल मंत्र से भटकते जा रहे हैं। इस दौर में मीडिया सहित अन्य क्षेत्रों में बड़े बदलाव आये हैं, यह बदलाव कई तरह की चुनौतियां भी लेकर आये हैं। तिवारी ने सरकारी संस्थानों में बढ़ते अवकाश और घटते कार्य दिवसों पर भी चिंता जताई। उन्होंने आंकड़ों की सहायता से बताया कि हमारे देश में इतने महापुरुष हैं कि यदि हम एक-एक की जयंती या पुण्यतिथि मनायें तो साल के 200 दिन अवकाशों में ही बीत जायेंगे। इन अवकाशों के चलते संस्थानों के कार्य और कर्मचारियों की कार्यक्षमता बहुत अधिक प्रभावित हो रही है। सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर ने बताया कि ‘हिंदी पत्रकारिता की द्वि-शताब्दी’के अवसर पर सप्रे संग्रहालय के संयोजकत्व में देश भर में अनेक आयोजन किए जा रहे हैं। यह आयोजन भी इसी श्रंंखला की एक कड़ी है। उन्होंने बताया कि इसी क्रम में आगामी 30 मई को नईदिल्ली के विज्ञान भवन में एक बड़ा आयोजन होने जा रहा है। जिसमें प्रधानमंत्री की मौजूदगी में पत्रकारिता पर डाक टिकट तथा स्मृति ग्रंथ का लोकार्पण किया जाना प्रस्तावित है। पत्रकारिता के योद्धा रहे गणेश शंकर विद्यार्थी का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि विद्यार्थी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से न केवल आम नागरिकों को, बल्कि उन युवाओं को भी प्रेरणा ग्रहण करना चाहिए जो पत्रकारिता के क्षेत्र में आना चाहते हैं।इस अवसर पर लोकमत के वरिष्ठ संपादक विकास मिश्र (नागपुर)को माधवराव सप्रे सम्मान,दैनिक ट्रिब्यून के अरुण नैथानी (चंडीगढ़) को महेश गुप्ता सृजन सम्मान और ब्रजेश शर्मा (नरसिंहपुर) को आंचलिक पत्रकारिता के राज्य स्तरीय ‘अशोक मनोरिया पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। सम्मान के तहत शॉल,श्रीफल और प्रशस्ति पत्र व पुरुस्कार राशि भी प्रदान की गई। हिंदी पत्रकारिता की दो सौ साल की यात्रा पर आयोजित संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल, विकास मिश्रा और अरुण नैथनी ने पत्रकारिता में आए बदलाव पर अपने विचार रखे। नागपुर से आये वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र ने कहा कि पुराने दौर के पत्रकारों की भाषा शुद्ध और समृद्ध होती थी। आज की भाषा में वह शुद्धता नहीं है। भाषा की यह अशुद्धता भी ठीक उसी तरह की चुनौती है जिस तरह आज विश्वसनीयता को लेकर चुनौती बनी हुई है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के पत्रकार इस क्षेत्र में एक ग्लैमर देख कर आ रहे हैं, जिससे स्वस्थ पत्रकारिता हाशिये पर पहुंच रही है। चंडीगढ़ से आये रुड़की मूल के वरिष्ठ पत्रकार अरुण नैथानी ने कहा कि समाज, चिकित्सा और पत्रकारिता दोनों ही क्षेत्रों से विश्वसनीयता की अपेक्षा रखता है,किंतु आज ऐसा नहीं हो पा रहा है। आज सोशल मीडिया ने सारे वातावरण को भ्रमित कर दिया है, जिसके दुष्परिणाम आने वाले समय में भुगतने होंगे। ऐेसे में इस माध्यम की आचार संहिता तय की जानी चाहिए। उन्होंने विजयदत्त श्रीधर द्वारा ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ पर लिखे तीन खंडों के शोध ग्रंथ को संक्षिप्त स्वरूप में एक साथ प्रकाशित किये जाने का सुझाव भी दिया।द्वितीय सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने कहा कि भारतीय पत्रकारिता के इतिहास पर दृष्टि डालें तो महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन के दौर के सबसे बड़े पत्रकार थे। उस समय के सबसे बड़े पत्र प्रताप में तिलक,गांधी और भगत सिंह ने भी काम किया था। यह बातें नई पीढ़ी के पत्रकारों के सामने नहीं आ पाती हैं, जिससे वे इसकी महत्ता को नहीं समझ पाते। उन्होंने पत्रकारिता के इतिहास के ऐसे कई अनछुए पहलुओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन बातों को पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए, जिससे नई पीढ़ी के पत्रकार इतिहास को सही रूप से समझ सकें। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के सामने खड़ी अनेक चुनौतियों में एक यह भी है कि नए पत्रकार इसके इतिहास को सही रूप में जान सके।दोनों सत्रों का संचालन सप्रे संग्रहालय के निदेशक अरविन्द श्रीधर ने किया। (लेखक आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ पत्रकार है) ईएमएस / 27 मार्च 26