नई दिल्ली,(ईएमएस)। देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के गलत इस्तेमाल को लेकर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा है कि वकीलों और वादियों द्वारा ऐसे ‘काल्पनिक’ फैसलों का हवाला देना, जो वास्तव में मौजूद ही नहीं हैं, एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि यह समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर की अदालतों में तेजी से फैल रही है। अदालत ने सभी पक्षकारों को सतर्क रहने की सलाह दी है। यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश पर आपत्ति जताई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की एक टिप्पणी को हटाते हुए कहा कि हालांकि राहत दी जा रही है, लेकिन एआई के गलत इस्तेमाल का मुद्दा गंभीर है और पहले से न्यायिक विचाराधीन है। दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि एक पक्ष की दलीलें चेटजीपीटी जैसे एआई टूल की मदद से तैयार की गई थीं। इन दलीलों में एक ऐसे फैसले का हवाला दिया गया था, जिसका वास्तविक दुनिया में कोई अस्तित्व ही नहीं था। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि दलीलों की भाषा, बुलेट प्वॉइंट्स, हरे टिक-मार्क और दोहराव जैसे संकेतों से यह स्पष्ट हो रहा था कि सामग्री एआई से तैयार की गई है। अदालत और उसके विधि सहायकों ने जिस कथित मामले—‘ज्योति पत्नी दिनेश तुलसियानी बनाम एलीगेंट एसोसिएट्स’— का जिक्र किया गया था, उसे काफी खोजने के बावजूद नहीं पाया। इससे अदालत का कीमती समय भी बर्बाद हुआ। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि शोध कार्य में एआई का उपयोग पूरी तरह से गलत नहीं है, लेकिन इसका प्रयोग करते समय तथ्यों और संदर्भों का सत्यापन करना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद न्यायिक प्रक्रिया में एआई के उपयोग को लेकर नई बहस छिड़ गई है और इसके जिम्मेदार उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। हिदायत/ईएमएस 28मार्च26