29-Mar-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। नेताओं ने वोट खरीदने का एक आसान और सरल रास्ता अपना लिया है। ये बात कोई और नहीं बल्कि आम आदमी कहता सुना जा रहा है। इस बार के चुनावों में राज्यों में होड़ लगी हुई है मुफ्त में रेबड़ियां बांटने की। नतीजा आम आदमी की जेब से निकलकर सीधे साढ़े 24 सौ करोड़ रुपए महिलाओं को बांट दिए जाएंगे। ताकि उन्हे वोट मिले और सत्ता पर काबिज हो जाएं। 5 राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों ने सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए कैश ट्रांसफर यानी सीधे नकद सहायता को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। एक विश्लेषण के अनुसार, चुनावी राज्यों में चार प्रमुख सरकारें महिलाओं के बैंक खातों में सीधे 24,500 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर रही हैं। इन दलों का चुनावी वादा भी यही है कि यदि वे दोबारा सत्ता में आते हैं, तो अगले पांच वर्षों तक यह वित्तीय सहायता निर्बाध रूप से जारी रहेगी। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो इन चार राज्यों में कुल 17.89 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें से 4.1 करोड़ महिलाएं इन नकद योजनाओं की सीधी लाभार्थी हैं। यानी कुल वोटरों का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर इन योजनाओं से जुड़ा है। विभिन्न राज्यों में इस नकद राजनीति के अलग-अलग रंग देखने को मिल रहे हैं। तमिलनाडु की सत्तारूढ़ सरकार ने स्पेशल समर पैकेज के नाम पर महिलाओं के खातों में 2-2 हजार रुपये डाल दिए हैं। वहीं, असम में बिहू उत्सव के उपलक्ष्य में महिलाओं को 4-4 हजार रुपये की सहायता दी गई है। केरल की वामपंथी सरकार स्त्री सुखम नकद योजना के जरिए करीब 10 लाख महिलाओं को हर महीने एक हजार रुपये दे रही है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार ने अपनी प्रसिद्ध लक्ष्मी भंडार योजना की राशि में 500 रुपये की बढ़ोतरी की है। दिलचस्प बात यह है कि खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के बावजूद बंगाल सरकार को इस योजना के लिए अगले साल 5,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ेगा। पिछले पांच वर्षों के चुनावी रुझान बताते हैं कि महिलाओं को नकद सहायता देने वाले राज्यों की संख्या 1 से बढ़कर अब 15 हो गई है। ये राज्य सालाना लगभग 2.46 लाख करोड़ रुपये 13 करोड़ से अधिक महिलाओं के खातों में भेज रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों ने इस रेवड़ी संस्कृति के दुष्प्रभावों पर भी चिंता जताई है। आंकड़ों के अनुसार, झारखंड जैसा राज्य अपने ग्रामीण विकास बजट का 81 प्रतिशत हिस्सा नकद ट्रांसफर में खर्च कर रहा है। इसके चलते महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों को बुनियादी विकास कार्यों और अन्य महत्वपूर्ण खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है। कई विकास परियोजनाएं धन के अभाव में अधूरी पड़ी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल नकद योजनाओं के दम पर चुनाव जीतना हमेशा संभव नहीं होता। सीएसडीएस के निदेशक प्रो. संजय कुमार के अनुसार, अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियां एक ही फॉर्मूले पर चल रही हैं, लेकिन यह हमेशा सफल नहीं होता। उदाहरण के तौर पर, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस और राजस्थान में कांग्रेस की सरकारें भारी-भरकम नकद योजनाओं के बावजूद सत्ता बचाने में विफल रहीं। इसके उलट, मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना और कर्नाटक में गृह लक्ष्मी जैसी योजनाओं को गेमचेंजर माना गया। वर्तमान में चुनावी राज्यों में मुफ्त राशन, मुफ्त गैस सिलेंडर और बेरोजगारी भत्ते जैसे वादों की झड़ी लगी हुई है, जिसने मतदाताओं को लुभाने की जंग को और तेज कर दिया है। वीरेंद्र/ईएमएस/29मार्च2026