लेख
30-Mar-2026
...


वे नन्हे हाथ जो कभी भीख के लिए उठते थे,अब उन्हीं हाथों में पेंसिल, कॉपी, किताब है और कंधे पर लटका स्कूली बस्ता।इन बच्चों ने कभी सोचा भी नही होगा कि वे कभी स्कूल जा पाएंगे।लेकिन इन बच्चों की आंखों में बसा स्कूल जाने का सपना आखिर साकार हो ही गया।दिल्ली के आठ युवकों के पास इतना पैसा था कि वे अपने शौक पूरे कर सकते थे, लेकिन उन्होंने भीख मांगने वाले बच्चों की मदद करने की ठानी। दिल्ली के आठ युवाओं ने भीख मांगने वाले बच्चों में शिक्षा की अलख जगाई है। दिल्ली की व्यवस्तम सड़कों के किनारे आम तौर पर भीख मांगते बच्चे दिखते है। इन युवाओं ने इन भीख मांगने वाले बच्चों को साक्षर बनाने का बीड़ा उठाया। चार्टर्ड एकाउंटेट की पढ़ाई पूरी कर चुके कुंदन अब अपना समय ऐसे बच्चों को शिक्षित करने के लिए देते हैं।उनके इस अभियान में जय सिंह, साहिल, विनीत, मनीष और विवेक भी शामिल हैं।ये अपनी जिंदगी के अहम क्षण ऐसे बच्चों को दे रहे हैं जिनका भविष्य अंधियारे में था। पहली बार सन 2015 में दिल्ली के कनॉट प्लेस में जब इन युवकों का सामना भीख मांगने वाले बच्चों से सामना हुआ तो उन्होंने बच्चों को शिक्षित, जागरुक और आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया। दिल्ली कनॉट प्लेस के पालिका बाजार के ऊपर बने पार्क में उन्होंने सड़क पर रहने वाले बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना शुरू किया।इन युवकों ने सेव चाइल्ड बेगर नाम की संस्था की स्थापना भी की।कुंदन के शब्दों में, ‘शुरुआत में हमने बच्चों को भीख मांगने से मना नहीं किया, हमने उनकी स्थिति और उन्हें स्वीकार किया, हमने उन्हें शिक्षित और उनके अंदर स्किल डेवलेपमेंट करने के बारे में सोचा।जब हम उनके बीच में बैठते तो बच्चे बहुत ही आम सवाल करते जैसे कि आप पेन लेफ्ट पॉकेट में क्यों रखते हो, क्या आप अपना रुमाल रोज धोते हो, ये छोटी-छोटी बातें हमें तो पता है लेकिन सड़क किनारे रहने वाले बच्चों को ये जानकारी नहीं है और ना ही उन्हें किसी ने बताने की कोशिश की। इन युवाओं ने बच्चों के अभिभावक बनकर उन्हें अच्छा और बुरा बताया, क्या सही है और क्या गलत है उन्हें समझाया, नशे की लत अगर किसी बच्चे में है तो उसका नशा खत्म कराने की ओर उसे प्रेरित किया।सन 2015 में कुछ बच्चों से शुरू हुआ अभियान सेव चाइल्ड बेगर अब दिल्ली के 12 केद्रों तक फैल गया है, इनका फोकस बच्चों को भीख मांगने की प्रवृत्ति से बचाने के साथ साथ नशे की लत से भी बचाना है। इस अभियान से जुड़े जय सिंह के शब्दों में, हमारा मुख्य उद्देश्य है बच्चों को भीख मांने से रोकना और उन्हें शिक्षित कर स्कूल तक पहुंचाना है। कई बच्चों में नशे की लत होती है उन बच्चों को नशे की लत से बाहर लाना एक बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में उन्हें हम मेडिकल सुविधा दिलाते हैं और उनकी काउंसलिंग कर उन्हें नशे के नकारात्मक प्रभावों के बारे में बताते हैं और नशे को छोड़ने के लिए प्रेरित करते हैं।” आज सेव चाइल्ड बेगर दिल्ली के 12 केंद्रों पर दो हजार से अधिक बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रही है। उन्हें सरकारी स्कूल में दाखिला कराना हो या अस्पताल में इलाज कराना ये युवा किसी भी काम से पीछे नहीं हटते।ऐसी एक ओर शख्सियत है अनुराधा भोंसले जिन्होंने हजारों बच्चों को बाल श्रम से आजादी दिलाई है और वे लगातार इस मिशन से जुडी हैं। अनुराधा ने बताया कि उनका मिशन है कि वह देशभर में बाल श्रम का शिकार हो रहे 70 हजार से ज्यादा बच्चों को उनके हक का बचपन दिला सकें। अनुराधा कहना हैं कि बहुत से बच्चों का बचपन जल रहा है जिन्हें उन्हें बचाना है।वे कहती है कि यदि बच्चों के अधिकार के लिए लड़ते हुए किसी ने उन्हें मार भी डाला तो वह उनके लिए बहुत सम्मानपूर्वक मौत होगी। अनुराधा अवनी नाम की संस्था के साथ काम करती हैं। वह सन1995 से गरीब बच्चों के लिए काम कर रही हैं।कौन बनेगा करोड़पति एपिसोड में कर्मवीर सम्मान से नवाज़ी गई अनुराधा भोसले हॉटसीट पर भी विराजमान हुईं। अनुराधा के साथ फिल्ममेकर नागराज मंजुले ने उनका सहयोग किया। दोनों ने शानदार तरीके से सवालों का जवाब देते हुए 25 लाख रुपए अवनी संस्था के नाम किये। अनुराधा भोंसले कहती हैं कि, गरीबी की वजह से चाईल्डा लेबर नहीं है, चाईल्डा लेबर की वजह से गरीबी है।अभी भी देश में बच्चोंख का इस्तेोमाल भीख मांगने के लिए होता है। बहुत सारे बच्चेे कूड़ा बीनने का काम करते हैं।इस देश में 4 करोड़ बच्चेा स्कू ल नही जा पा रहे है। वे सन 1995 से कचरा बीनने वाले बच्चोंई के लिए काम कर रही हैं। उनका एकमात्र लक्ष्यं यही है कि वह उनका बचपन, उनकी शिक्षा और उनका हक दिला सके।उन्होंरने कोल्हाईपुर में शेल्ट5र होम्स् बनवाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी ।इसी का परिणाम रहा कि वे 70 हजार बच्चों का बचपन बचाने में कामयाब हो पाई।आगे भी उनका अभियान जारी है।उनका कहना है कि जब तक जिऊंगी बच्चों के लिए काम करती रहूंगी।ऐसी ही एक बाल उद्धारक शख्शियत है सिंधुताई। सिंधुताई ने बताया कि वह 20 साल की थी और उनकी बच्ची 10 दिन की। उन्हें ससुराल और मायके वालों ने निकाल दिया था। किसी ने कहा, ये औरत अच्छी नहीं है। लेकिन भूख तो लगती ही है ।इसलिए कुछ तो करना ही था।पहले बगैर टिकट ट्रेन में घूमती रही। स्टेशनों पर भिखारियों के साथ खाना खा लेती थी। भिखारियों ने उन्हें संरक्षण दिया। दिन तो गुजार देती थी लेकिन रात को डर लगता था। केवल 20 साल की जो थी। रात को श्मशान जाती थी सोने के लिए। उन्हें पता था कि वहां कोई मरने के बाद ही आएगा। रात को जब कोई उन्हें देखता तो भूत-भूत कहकर चिल्लाने लगता और भाग जाता था। श्मशान में रहने के बाद मिल बांटकर खाना सीखा और सभी को अपनाना शुरू किया। जिसका कोई नहीं उसकी वह मां बन गई। सिंधुताई ने 1200 बच्चों को गोद लिया और उनका सारा खर्च उठाया।उन्हें अब तक 750 अवार्ड्स मिल चुके हैं। उनके अवॉर्ड्स में राष्ट्रपति सम्मान और अहिल्याबाई पुरस्कार भी शामिल हैं। सिंधुताई ने अमिताभ बच्चन के हाथों पुरस्कार ग्रहण किया और 25 लाख रुपये भी जीते।वास्तव में समाज के लिए प्रेरक व्यक्तित्व है सिंधुताई और बचपन संवारने वाले ये युवा। (लेखक आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ पत्रकार है।) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 30 मार्च /2026