लेख
30-Mar-2026
...


मध्य-पूर्व एक बार फिर वैश्विक अस्थिरता के केंद्र में है। ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम पर चल रही बातचीत निर्णायक चरण में पहुँचती दिख रही थी। जैसा 26 फरवरी को ओमान के विदेश मंत्री द्वारा “महत्वपूर्ण प्रगति” की बात कही गई थी। तब अचानक 28 फरवरी को अमेरिका द्वारा ईरान पर की गई सैन्य कार्रवाई ने पूरे समीकरण को ही बदल दिया। इसे “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” कहा गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उक्त ऑपरेशन का उद्देश्य ईरान के परमाणु मिसाइल कार्यक्रम को निष्क्रिय करना, क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना तथा तथाकथित “प्रतिरोध नेटवर्क” को कमजोर करना बताया। मीडिया में दावा किया गया कि यह सैन्य कार्रवाई अमेरिका ने ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर जो ट्रंप प्रशासन में विशेष शांति दूत की भूमिका में है, विदेश मंत्री व रक्षा मंत्री की सलाह पर इजरायल के कहने से की गई। परन्तु लगभग 27 दिनों के संघर्ष के बाद भी ‘‘कोई भी लक्ष्य’’ की स्पष्ट प्राप्ति नहीं हो सकी है। उलटे, अमेरिका द्वारा ‘‘अनावश्यक लादे गए’’ इस युद्ध ने विश्व को एक ऐसे संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है, जहाँ से निकलने का मार्ग अभी धुंधला दिखाई देता है। ‘‘ युद्ध की प्रकृति और विशेषता।’’ इस युद्ध की एक उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि ईरान ने ‘‘प्रत्यक्ष आक्रामकता’’ के बजाय रक्षात्मक प्रतिरोध का उद्देश्य सामने रखकर “प्रतिक्रियात्मक रणनीति” अपनाई। ईरान ने ‘‘पहले’’ हमला करने से परहेज किया और हर सैन्य ‘‘आक्रमण’’ कार्रवाई का ‘‘प्रत्युत्तर’’ उसी ‘‘अनुपात’’ में देने की नीति अपनाई। उसने युद्ध को पूर्ण विस्तार लेने से कुछ हद तक रोके रखा। ट्रंप से मिली हमलों की धमकियों के मामले में भी ईरान ने यही नीति अपनाई। ‘‘ वैश्विक प्रभावः ऊर्जा से अर्थव्यवस्था तक ।’’ सैन्य संघर्ष का प्रभाव केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित न रहकर वैश्विक स्तर पर होकर फैल रहा है। कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति पर दबाव, होर्मुज जलडमरूमध्य से समुद्री यातायात में बाधा, वैश्विक महंगाई में संभावित वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखलाओं में अस्थिरता, भारत सहित अधिकांश देश इस प्रभाव व दुष्परिणाम से अछूते नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संसद में स्वीकारा ‘‘यह संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है’’। ‘‘ भारत की कूटनीतिः संतुलन या झुकाव? ’’ भारत के संबंध अमेरिका, इजरायल, और ईरान तीनों से ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण व अच्छे रहे हैं। खासकर प्रधानमंत्री मोदी के जमाने में इजराइल व अमेरिका से प्रगाढ़ व प्रेसीडेंट ट्रंप से बेहद व्यक्तिगत संबंध स्थापित हुए हैं, जिसने रूस-भारत संबंध को भी एक कदम पीछे छोड़ दिया। प्रधानमंत्री मोदी जब पिछली बार वर्ष 2016 में ईरान गये थे, तब उन्होंने यह कहा था कि दोनों देशों की दोस्ती ‘‘नई’’ नहीं है, बल्कि ‘‘इतिहास जितनी पुरानी’’ हैं। भारत के व्यापारिक फायदे के लिए चाबहार बंदरगाह विकास, व्यापार-परिवहन ट्रांजिट समझौते हुए। रणनीतिक स्वायत्तता का अभाव। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार ‘‘डायलॉग और डिप्लोमेसी’’ से शांति की कूटनीति अपनाने की अपील की है। यद्यपि इसके पीछे शायद उनकी सोच वहां रह रहे एक करोड़ से अधिक भारतीयों की सुरक्षा व उर्जा आपूर्ति रही है। ‘‘आक्रमणकारी’’ अमेरिका के ईरान पर किए हमले की प्रधानमंत्री ने ‘‘आलोचना’’ नहीं की, जो करनी चाहिए थी। खासकर तब, जब वे ‘‘गल्फ देशों’’ में स्थित अमेरिका के सैन्य अड्डों पर ईरान की बमबारी की आलोचना कर रहे है। तब मोदी निष्पक्ष नहीं दिख सके। स्पष्ट है, इस कारण वे देश के विपक्ष की आलोचनाओं का शिकार भी हुए प्रधानमंत्री का टीवी 09 समिट में दिया गया यह कथन कि भारत ने फैसले लेने का ‘‘सार्मथ्य’’ दिखाया है, स्वीकार योग्य नहीं है, क्योंकि वह तथ्यों के विपरीत है। वस्तुतः भारत की विदेश नीति में परंपरागत रूप से ‘‘रणनीतिक स्वायत्तता’’ पर आधारित रही है। परन्तु वर्तमान में इसका अभाव सा दिखता है। ‘‘ प्रधानमंत्री को गुलाम कहना! कांग्रेस की गुलामी प्रवृत्ति’’! कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता पवन खेड़ा का पत्रकार वार्ता में भारत के चुने हुए लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी का नाम लिए बिना ‘‘साहब बीबी और गुलाम’’ पोस्टर का इस्तेमाल कर उन्हें ‘‘गुलाम’’ कहना बेहद ‘‘शर्मनाक’’ है। इसे किसी भी रूप में कदापि स्वीकार नहीं किया जा सकता है। वास्तव में यह कांग्रेस की ‘‘गुलामी’’ की कार्यशैली की प्रवृत्ति का ‘‘अवतरण’’ है। इस कथन की सर्वत्र घोर निंदा की जानी चाहिए थी। पिछले 14 महीने से भारत को अमेरिका के प्रति ‘‘नीति’’ रणनीति स्वायत्तता के अभाव में ‘‘चिंता’’ का विषय। वर्ष 2025 में ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी के ट्रंप के दबाव में आने से गुटनिरपेक्ष नीति को अगवा करने वाले भारत की विदेश नीति की ‘‘दिशा’’ बदलने से वह भारतीय हितों को प्रभावी रूप से ‘‘साध’’ नहीं पा रही है। यह किस दबाव में? अलग विषय है। लेकिन निश्चित रूप से 15 महीने के ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में ट्रंप के भारत व मोदी के संबंध में विभिन्न मुद्दों पर दिये गये बयानों के अवलोकन से स्पष्ट है कि ट्रंप भारत पर ‘‘टर्म डिक्टेट’’ कर रहा है। लगभग हर बार ट्रंप ने भारत की संप्रभुता, सार्वभौमिकता पर आक्रमण कर ‘‘अपमानित’’, निम्नतर करने की लगातार कोशिश की है। इससे जहां हम विश्व गुरु बनने की बात कर रहे थे, वहां हमारी एक सार्वभौमिक मजबूत राष्ट्र की छाप पर बड़ा धक्का लगा है। इसके परिणामों व दुष्प्रभावों का आगे हम अध्ययन करते हैं। 1. सबसे बड़ी भूल जो भारत की ओर से हुई, ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई पर प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री द्वारा शोक व्यक्त न करना, जबकि पाकिस्तान ने किया। 5 दिन बाद ईरानी दूतावास जाकर भारत के विदेश मंत्री ने शोक संदेश लिखा। इसके पूर्व वर्ष 2024 में ईरान के राष्ट्रपति की मृत्यु हो जाने पर भारत सरकार ने एक दिन का राष्ट्रीय शोक रखा था। 2. लगभग 168 स्कूल के बच्चे अमेरिका-इजरायल द्वारा मौत के घाट उतारे जाने पर भारत द्वारा कोई आलोचना न करना, खेद जनक है। मात्र गहरी शोक संवेदना व्यक्त की। उक्त कृत्य अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन भी है। 3. भारत को रूस से सस्ते दरों पर तेल मिल रहा था। लेकिन अमेरिका के दबाव के चलते शैनः शैनः क्रय बंद करना पडा। विश्व गुरु बनने के मिशन के चलते अमेरिका की परमिशन से रूस से फिर तेल खरीदना चालू किया। इसमे कोई शक नहीं है कि मोदी के ‘‘माई फ्रेड़’’, ‘‘अबकी बार ट्रंप सरकार’’, कहकर जो घनिष्ठ संबंध बनाये थे, उसका फायदा भारत को नहीं मिला, बल्कि अमेरिका ने भारत को ‘‘मानमर्दित’’ कर एकतरफा नाजायज फायदा लिया। इससे हमारे रूस व ईरान से सौहार्द संबंधों को भी नुकसान पहंुचा। 4. हमारे यहां कहावत है न ‘‘पुलिस की दोस्ती अच्छी न दुश्मनी’’। उसी प्रकार का कथन अमेरिका के बाबत कहा जाता है। ‘‘अमेरिका की दोस्ती अच्छी नहीं, दुश्मनी और भी खराब’’। अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक है, लेकिन दोस्त होना जानलेवा है। वर्तमान में यह देखने को मिल रहा है। पहले भी वर्ष 1971 के बांग्लादेश युद्ध में हमने देखा, अमेरिका ने पाकिस्तान की सहायता के लिए सातवां बेड़ा भेजा था। 5. यद्यपि नरेन्द्र मोदी ईरान के राष्ट्रपति से बार बार बातचीत कर संबंधों को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं, जिसकी अभी यह सुखद परिणाम आया है कि ईरान ने जिन पांच देशों को होर्मुज समुद्री में ‘‘निर्बाध’’ रास्ता दिया है जिसमें भारत भी शामिल है। 6. ईरान के संवैधानिक मान्यता प्राप्त पद सर्वोच्च नेता ‘‘अली खामेनेई’’ जो सिर्फ ईरान के ही नहीं बल्कि शिया संप्रदाय के विश्व के सर्वोच्च धार्मिक नेता हैं, की हत्या की भर्त्सना किए बिना, उन्हे श्रद्धांजलि दिये बिना, ईरान के ‘‘घाव’’ शायद ही भरें। बल्कि कहीं न कहीं ‘‘बातचीत’’ में वे घाव ‘‘हरे’’ हो जाते है। भारतीय संस्कृति के झंडाबरदार मोदी ऐसा मानवीय कदम क्यों नहीं उठा पा रहे हैं, समझ से परे है, जो उन्हें करना चाहिए था। देश में इस संकट के कारण पुनः कोरोना स्थिति आने की आशंका दिख रही, जैसे कि प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘‘देश की जनता को तैयार हो जाना चाहिए’’। दुर्भाग्य से इस बयान ने देश में एक भय की भ्रम की भावना पैदा हो रही है। मोदी का युद्ध पूर्व इजरायल दौरा! क्या आत्मघाती कदम? ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध में भारत की ओर से दो सबसे महत्वपूर्ण त्रुटि हुई लगती है। प्रथम युद्ध की आशंकाओं के बादलों के चलते सैन्य आक्रमण प्रारंभ होने के 48 घंटे पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दौरा एक आत्मघाती कदम सिद्ध हो रहा है। हमारी खुफिया एजेंसीज इस स्थिति का आकलन करने में क्या असफल हो गई थी? इजरायली संसद ‘‘नेसेट’’ को संबोधित करने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री बनने के पूर्व मोदी जुलाई 2017 में इजराइल का दौरा कर देश के पहले प्रधानमंत्री बन चुके हैं। मोदी ने संबोधन में कहा भारत का ‘‘वसुधैव कुटुंबकम’’ और इजरायल का ‘‘टिक्कुन ओलम’’ साझा दृष्टिकोण है। इसी के साथ दूसरी गलती अली खामनेई को श्रद्धांजलि न देना। निष्कर्ष। आज आवश्यकता है, एक ऐसी संतुलित, साहसिक और स्पष्ट नीति की, जो न केवल भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे, बल्कि वैश्विक शांति में भी भारत की प्रमुख, महत्वपूर्ण रचनात्मक भूमिका हो। दुर्भाग्यवश यह भूमिका ‘‘अपुष्ट’’ समाचारों के अनुसार पाकिस्तान के हाथों में जा रही है जो हमारी विदेश नीति पर एक प्रश्नचिंह लगाता है। ट्रंप का ताजा बयान कि ईरान समझौते के लिए ‘‘बेताब’’ है, तथापि ईरान का एक भी बयान इस संबंध में अभी तक नहीं आया, बल्कि खंड़न आया। ‘‘बेताबी’’ तो साफ ट्रंप की झलक रही है। (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 30 मार्च /2026