(31 मार्च भगवान महावीर जयंती) आज की यह सुनहरी सुबह अपने साथ एक बहुत ही गहरा और पावन संदेश लेकर आई है, क्योंकि आज 31 मार्च है और पूरा देश भगवान महावीर की जयंती का उत्सव मना रहा है। यह दिन महज एक तारीख नहीं, बल्कि खुद के भीतर झांकने का एक सुनहरा अवसर है जो हमें उस महापुरुष की याद दिलाता है जिसने महलों के सुख को तिनके की तरह त्याग दिया था। बिहार के वैशाली की वह पावन भूमि, जहाँ राजकुमार वर्धमान का जन्म हुआ था, आज भी उस त्याग की गवाह है जिसने एक राजकुमार को महावीर बना दिया। तीस साल की छोटी सी उम्र में जब उन्होंने राजसी वैभव छोड़ा, तो उन्हें किसी राज्य की नहीं बल्कि उस सत्य की तलाश थी जो इंसान को जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त कर सके। बारह वर्षों की कठिन तपस्या और मौन साधना के बाद उन्हें जो कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ, वह केवल जैन धर्म के लिए नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए एक संजीवनी बनकर उभरा। महावीर का सबसे क्रांतिकारी संदेश था जीओ और जीने दो, जो सुनने में जितना सरल है, जीवन में उतारना उतना ही चुनौतीपूर्ण। उनके दर्शन की नींव अहिंसा पर टिकी है, जो केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी का दिल दुखाना या मन में बुरा सोचना भी एक तरह की हिंसा ही है। आज जब दुनिया युद्धों और नफरत के साये में जी रही है, तब महावीर के विचार किसी मरहम की तरह महसूस होते हैं। उन्होंने अपरिग्रह का मंत्र दिया, जिसका अर्थ है अपनी जरूरतों को सीमित रखना, क्योंकि अनावश्यक संग्रह ही दुखों की असली जड़ है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम जितना कम सामान और इच्छाएं बटोरेंगे, हमारा मन उतना ही शांत और हल्का रहेगा। उनका अनेकांतवाद का सिद्धांत तो आज के समाज के लिए सबसे जरूरी है, जो हमें सिखाता है कि एक ही सत्य को देखने के कई नजरिए हो सकते हैं। अगर हम दूसरों के विचारों का सम्मान करना सीख लें, तो समाज के आधे विवाद तो यूँ ही खत्म हो जाएँगे। महावीर ने जात-पात और ऊंच-नीच के भेदभाव को सिरे से नकारते हुए सिखाया कि एक चींटी की जान भी उतनी ही कीमती है जितनी कि किसी सम्राट की। उन्होंने स्त्रियों को भी साधना में बराबर का अधिकार दिया और प्राकृत जैसी जनभाषा में उपदेश दिए ताकि उनकी बात सीधे आम आदमी के दिल तक पहुँच सके। वे कोई चमत्कारी पुरुष नहीं बनना चाहते थे, बल्कि एक ऐसे मार्गदर्शक थे जिन्होंने सिखाया कि हर आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति छिपी है। आज उनकी जयंती मनाते हुए हमें खुद से यह सवाल करना चाहिए कि क्या हम वाकई उनके बताए रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहे हैं? मंदिरों में माथा टेकना तो आसान है, लेकिन उनके सिद्धांतों को जीना ही सच्ची श्रद्धा है। अहिंसा का मार्ग वीरों का मार्ग है और क्षमा इसका सबसे सुंदर आभूषण है, क्योंकि किसी को माफ कर देना खुद को एक भारी बोझ से मुक्त कर लेने जैसा है। महावीर ने प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा का संदेश भी सदियों पहले दे दिया था, जब उन्होंने पेड़-पौधों में भी जीवन देखने की बात कही थी। आज जब हम ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रहे हैं, तो उनकी सूक्ष्म दृष्टि किसी आधुनिक विज्ञान जैसी सटीक लगती है। मिट्टी, पानी और हवा को शुद्ध रखना उनके अहिंसा धर्म का ही एक अभिन्न हिस्सा है। वे एक ऐसे शांत योद्धा थे जिन्होंने बिना शस्त्र उठाए संसार को जीत लिया और हमें सिखाया कि असली बहादुरी अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पाने में है। महावीर जयंती के दिन जैन मंदिरों में गूंजते जयकारे और केसरिया ध्वज हमें एक अलग ही ऊर्जा से भर देते हैं, लेकिन इस महापर्व की असली सार्थकता तभी है जब हमारे भीतर किसी जरूरतमंद के लिए करुणा जगे। धर्म का असली मतलब केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि शुद्ध आचरण और इंसानियत को गले लगाना है। महावीर जयंती हमें याद दिलाती है कि शांति बाहर के शोर में नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर के मौन में छिपी है। आइए, आज के दिन हम अपने भीतर जमी कड़वाहट को साफ करने का संकल्प लें और ज्ञान का वह दीपक जलाएं जो अंधकार को मिटा दे। भगवान महावीर के चरणों में नमन करते हुए हम एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ न कोई डरा हुआ हो और न ही कोई किसी को डराने वाला हो। उनकी वाणी आज भी हवाओं में गूंज रही है, बस हमें उसे सुनने की फुर्सत चाहिए। आप सभी को महावीर जयंती की यह पावन बेला बहुत-बहुत मंगलमय हो और यह दिन आपके जीवन में अपार शांति लेकर आए। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 30 मार्च 26