-पांच राज्यों में लोकलुभावन घोषणाओं की प्रतिस्पर्धा, बढ़ते कर्ज और आर्थिक दबाव पर उठे सवाल नई दिल्ली,(ईएमएस)। देश के 05 राज्यों में मतदान की तारीख करीब आने से विधानसभा चुनावों की सरगर्मी बढ़ गई है। ऐसे में राजनीतिक दलों के बीच ‘फ्रीबीज’ यानी लोकलुभावन योजनाओं की होड़ तेज हो गई है। चुनावी माहौल में जनता को लुभाने के लिए बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं, जिसके चलते रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूल मुद्दे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं। इन चुनावी राज्यों में जहां भाजपा बहुसंख्यक वोटबैंक को साधने के लिए लोकलुभावन वादे किए जा रही है तो वहीं पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना की राशि बढ़ाने और बेरोजगार युवाओं को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। वहीं, कांग्रेस ने असम में सत्ता में आने पर महिलाओं को स्वरोजगार के लिए 50 हजार रुपये देने का वादा किया है। तमिलनाडु में एएमएमके ने किसानों की कर्ज माफी समेत 120 से अधिक वादों का ऐलान किया है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यह ट्रेंड अब चुनावी राजनीति का स्थायी हिस्सा बनता जा रहा है, जहां एक दल दूसरे से अधिक आकर्षक घोषणाएं कर जनता का ध्यान खींचने की कोशिश करता है। हाल के वर्षों में बिहार विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण रहा, जहां बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरियों और आर्थिक सहायता के वादे किए गए थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन ‘फ्रीबीज’ को अक्सर जनकल्याण के नाम पर पेश किया जाता है, लेकिन कई बार यह वोटरों को प्रभावित करने का साधन बन जाता है। मुफ्त योजनाओं के शोर में रोजगार सृजन, औद्योगिक विकास और बुनियादी ढांचे जैसे अहम मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। आंकड़ों के अनुसार, 2018-19 में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा सब्सिडी पर कुल 1.87 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, जो 2024-25 में बढ़कर 4.72 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह राज्यों के कुल खर्च का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कर्ज का स्तर लगातार बढ़ रहा है, जिससे वित्तीय स्थिरता को लेकर चिंताएं गहराती जा रही हैं। रिजर्व बैंक भी पूर्व में इस प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर कर चुका है। विशेषज्ञों की मानें तो यदि संसाधनों का बड़ा हिस्सा लोकलुभावन योजनाओं में खर्च होगा, तो इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं के लिए धन की कमी हो सकती है, जिससे आर्थिक प्रगति की रफ्तार प्रभावित होती है। हालांकि, यह भी माना जा रहा है कि सभी योजनाओं को एक नजर से देखना उचित नहीं है। कई कल्याणकारी योजनाएं वास्तव में जरूरतमंदों के लिए सहारा बनती हैं, लेकिन चुनावी लाभ के लिए अंधाधुंध वादों की प्रवृत्ति पर नियंत्रण आवश्यक है, ताकि दीर्घकालिक विकास और वित्तीय संतुलन बनाए रखा जा सके। हिदायत/ईएमएस 31मार्च26