लेख
01-Apr-2026
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(हनुमान जन्मोत्सव (2 अप्रैल) पर विशेष) सनातन धर्म में सप्ताह के प्रत्येक दिन को किसी न किसी देवता को समर्पित किया गया है और भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त पवनपुत्र हनुमान को मंगलवार का दिन समर्पित माना गया है। हनुमान जयंती, जिसे ‘हनुमान जन्मोत्सव’ भी कहा जाता है, प्रतिवर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इस वर्ष यह पावन पर्व 2 अप्रैल को मनाया जा रहा है। हनुमान जयंती को ‘हनुमान जन्मोत्सव’ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि महाबली हनुमान आज भी धरती पर विद्यमान हैं और अपने भक्तों की सहायता के लिए सदैव उपस्थित रहते हैं। पुराणों के अनुसार, जब हनुमानजी ने भगवान श्रीराम की सेवा, भक्ति और समर्पण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया, तब माता सीता ने उन्हें अमरता का वरदान दिया था। यही कारण है कि उन्हें ‘चिरंजीवी’ माना जाता है और उनके जन्मोत्सव को विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हिन्दू समाज के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सांस्कृतिक चेतना और आस्था का प्रतीक है। हनुमान जन्मोत्सव अच्छाई की विजय और न्याय की स्थापना के संकल्प का स्मरण कराता है। यह दिन सभी को प्रेरणा देता है कि वे धर्म के मार्ग पर चलते हुए जीवन में सच्चाई, सेवा और समर्पण को अपनाएं। भगवान श्रीराम का जन्म लगभग 5114 ईसा पूर्व अयोध्या में हुआ माना जाता है और यह मान्यता है कि हनुमानजी का जन्म श्रीराम के जन्म से पूर्व हुआ था ताकि वे श्रीराम की सेवा में समर्पित हो सकें। हनुमानजी हिन्दू धर्म के सबसे पूज्यनीय और लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। उनकी पूजा केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में फैले हिन्दू समुदाय द्वारा श्रद्धा और भक्ति भाव से की जाती है। भगवान हनुमान को कलियुग का देवता माना गया है, जो शीघ्र प्रसन्न होते हैं। यह मान्यता है कि सच्चे मन से उनकी पूजा करने से सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं, आरोग्यता प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को हनुमानजी की पूजा अत्यंत फलदायक मानी जाती है। हनुमान चालीसा का पाठ इस दिन विशेष रूप से किया जाता है। 16वीं शताब्दी के महान संत, कवि और भक्त गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा की रचना की थी, जो आज भी करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केन्द्र है। हनुमान चालीसा में हनुमानजी के गुण, पराक्रम, भक्ति और उनके चमत्कारों का विस्तारपूर्वक वर्णन है। ऐसा कहा जाता है कि इसका पाठ करने से भय और दुख दूर होते हैं और साधक को मानसिक शांति प्राप्त होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान हनुमान का जन्म त्रेतायुग में हुआ था, जब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। भगवान शिव ने भगवान राम की सेवा हेतु रुद्रावतार हनुमान के रूप में जन्म लिया। वाल्मीकि रामायण, महाभारत, पुराणों और अन्य ग्रंथों में हनुमानजी के पराक्रम, भक्ति और सेवाभाव का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। माता अंजना और वानरराज केसरी के पुत्र हनुमान को जन्म से ही असाधारण शक्तियां प्राप्त थीं। उन्हें सूर्य से शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य मिला और अनेक देवी-देवताओं ने उन्हें अपने-अपने आशीर्वाद से शक्तिशाली बना दिया। हनुमानजी को अष्ट सिद्धियां और नव निधियां प्राप्त हैं। यही कारण है कि उन्हें अजेय, अमर और महाबली देवता माना गया है। हनुमानजी की भक्ति और शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण रामायण में मिलता है, जब उन्होंने माता सीता की खोज में समुद्र पार किया, लंका दहन किया और संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मणजी के प्राणों की रक्षा की। उनका समर्पण, साहस और त्याग अप्रतिम है। वे केवल पराक्रमी योद्धा ही नहीं बल्कि एक अत्यंत बुद्धिमान और विनम्र भक्त भी हैं। ‘संकटमोचन’ कहे जाने वाले हनुमान अपने भक्तों को हर प्रकार के संकट से उबारते हैं और उन्हें भय, पीड़ा तथा क्लेश से मुक्त करते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से हनुमानजी की उपासना करता है, वह जीवन में आने वाली सभी बाधाओं को पार करते हुए सफलता की सीढ़ियां चढ़ता है। हनुमानजी के नामकरण को लेकर भी एक विशेष कथा प्रचलित है। संस्कृत में ‘हनु’ का अर्थ होता है दाढ़ी। पौराणिक मान्यता के अनुसार, बाल्यावस्था में जब हनुमानजी को तीव्र भूख लगी तो उन्होंने सूर्य को एक लाल फल समझकर खाने के लिए दौड़ लगा दी। उसी समय राहु भी सूर्यग्रहण के लिए आया था लेकिन हनुमानजी ने राहु को भगा दिया और सूर्य को निगल लिया। इससे संसार में अंधकार फैल गया। राहु ने देवताओं से जाकर शिकायत की तो देवराज इंद्र ने क्रोधित होकर हनुमान पर अपने वज्र से प्रहार किया, जिससे उनकी दाढ़ी में चोट आई और वे मूर्छित हो गए। जब पवनदेव को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने पूरे ब्रह्मांड में वायु का प्रवाह रोक दिया। सृष्टि में हाहाकार मच गया और तब सभी देवताओं ने ब्रह्मा जी की अगुवाई में पवनदेव को मनाया और हनुमानजी को जीवनदान दिया। इस दिन को ही उनके जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। हनुमानजी का चरित्र आज के युग के लिए प्रेरणास्रोत है। वे शक्ति, सेवा, समर्पण और विनम्रता के अद्भुत संगम हैं। उनका जीवन दर्शाता है कि किसी भी शक्ति का प्रयोग केवल धर्म और सेवा के लिए किया जाना चाहिए। वे निर्भयता और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक हैं। भक्तों का विश्वास है कि हनुमानजी की आराधना से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। आज जब संसार अनेक प्रकार की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब हनुमान जन्मोत्सव का संदेश हमें शक्ति, साहस और संकल्प के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उनकी भक्ति, निष्ठा और सेवा का भाव प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में होना चाहिए ताकि हम सभी अपने कर्त्तव्यों का निष्ठा से पालन करते हुए समाज और राष्ट्र की सेवा कर सकें। हनुमान जन्मोत्सव न केवल एक धार्मिक पर्व है बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक एकता और अध्यात्मिक ऊर्जा का भी उत्सव है। (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं) ईएमएस / 01 अप्रैल 26