तेहरान,(ईएमएस)। पश्चिम एशिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अंतरराष्ट्रीय तनाव एक बार फिर चरम पर है। ईरान ने इस पूरे क्षेत्र पर अपना संप्रभु दावा जताते हुए यहाँ से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने की बात कही है, जिसने इस रणनीतिक जलमार्ग पर अधिकार और नियंत्रण की एक नई वैश्विक बहस छेड़ दी है। लगभग 50 किलोमीटर चौड़े इस जलडमरूमध्य का मुख्य नौवहन मार्ग मात्र 15 किलोमीटर चौड़ा है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन रास्तों में गिना जाता है। समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र के नियमों के अनुसार, कोई भी देश अपनी तटरेखा से केवल 12 समुद्री मील तक के जल क्षेत्र पर ही पूर्ण अधिकार रख सकता है। इसी आधार पर ईरान खुद को खाड़ी क्षेत्र की सबसे प्रभावशाली शक्ति मानते हुए नियंत्रण की बात कर रहा है। हालांकि, भौगोलिक और कानूनी दृष्टि से यह दावा एकपक्षीय प्रतीत होता है क्योंकि ओमान भी खुद को इस जलमार्ग का गेटकीपर मानता है। ओमान का मुसंदम प्रायद्वीप इस मार्ग के मुहाने पर स्थित है और अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए सबसे सुरक्षित और गहरा समुद्री रास्ता ओमान के क्षेत्रीय जल क्षेत्र से होकर गुजरता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में ओमान और ईरान के बीच समन्वय के पुराने समझौते अस्तित्व में हैं। इसके अतिरिक्त, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की समुद्री सीमाएं भी इस क्षेत्र से जुड़ी हैं। ईरान और यूएई के बीच अबू मूसा और टुनब द्वीपों को लेकर चल रहा पुराना विवाद इस क्षेत्र की सामरिक जटिलता को और बढ़ा देता है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत यहाँ मीडियन लाइन यानी मध्य रेखा का सिद्धांत लागू होता है, जिसके अनुसार समुद्र को संबंधित देशों के बीच बराबर बांटा जाता है। इस व्यवस्था के तहत ईरान और ओमान अपने-अपने हिस्सों में अधिकार तो रखते हैं, लेकिन वे अंतरराष्ट्रीय जहाजों की निर्बाध आवाजाही को कानूनी रूप से नहीं रोक सकते। स्पष्ट है कि होर्मुज पर किसी एक देश का पूर्ण एकाधिकार नहीं है। ईरान के ताजा दावे ने न केवल क्षेत्रीय संतुलन को चुनौती दी है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए भी एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। वीरेंद्र/ईएमएस/01अप्रैल 2026