- लागत और समयसीमा पर संकट जबलपुर, (ईएमएस)। पश्चिम एशिया में ईरान पर हुए सैन्य हमलों के बाद वैश्विक स्तर पर पैदा हुए तनाव का असर अब सीधे तौर पर देश के निर्माण कार्यों पर दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उछाल के चलते न सिर्फ रिंग रोड, बल्कि शहर और प्रदेश में चल रहे लगभग सभी बड़े निर्माण कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ गई है। ठेका कंपनियां बढ़ती लागत और संसाधनों की कमी के कारण काम आगे बढ़ाने में असमर्थता जता रही हैं। गौरतलब है कि पश्चिम एशिया संकट के चलते डामर (बिटुमेन) की कीमतों में करीब 50 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं कमर्शियल डीजल लगभग 22 रुपये प्रति लीटर तक महंगा हो गया है। सड़क निर्माण, भवन निर्माण, फ्लाईओवर, सीवर लाइन, पाइपलाइन और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में डामर और ईंधन की अहम भूमिका होती है। ऐसे में लागत का पूरा गणित गड़बड़ा गया है। भारी मशीनों, जेसीबी, पोकलेन, हॉटमिक्स प्लांट और ट्रांसपोर्ट वाहनों के संचालन का खर्च तेजी से बढ़ा है, जिससे कंपनियों का बजट नियंत्रण से बाहर हो रहा है। सड़क, भवन पाइपलाइन सब प्रभावित.. स्थिति केवल सड़क परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। शहर में चल रहे सरकारी भवन निर्माण, आवासीय योजनाएं, ड्रेनेज और सीवरेज लाइन विस्तार, जल प्रदाय योजनाएं, स्मार्ट सिटी के कार्य, ओवरब्रिज और फ्लाईओवर जैसे प्रोजेक्ट भी प्रभावित हो रहे हैं। निर्माण सामग्री की ढुलाई महंगी होने से सीमेंट, सरिया, गिट्टी और रेत की आपूर्ति भी बाधित हो रही है। कई साइटों पर काम आंशिक रूप से रोकना पड़ा है या श्रमिकों की संख्या घटानी पड़ी है। लॉजिस्टिक संकट ने रोके तकनीकी कार्य .. व्यावसायिक सिलेंडरों की आपूर्ति प्रभावित होने से सड़क मार्किंग, वेल्डिंग और अन्य तकनीकी कार्यों में बाधा आ रही है। कई साइटों पर मजदूरों के लिए भोजन और अन्य मूलभूत सुविधाओं का प्रबंधन भी चुनौती बन गया है। ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ने से दूर-दराज से सामग्री मंगवाना महंगा और समय लेने वाला हो गया है। समय-सीमा पर बड़ा असर … कई परियोजनाएं जो 2026 तक पूरी करने का लक्ष्य लेकर चल रही थीं, अब अनिश्चित देरी की ओर बढ़ रही हैं। जिन पैकेजों या चरणों का कार्य 60 से 70 प्रतिशत तक पूरा हो चुका है, वहां भी अंतिम चरण की लागत बढ़ने से काम की गति धीमी हो गई है। ठेकेदार एजेंसियां शासन से दर संशोधन (रेट रिवीजन) और अतिरिक्त बजट की मांग कर सकती हैं। यदि कच्चे तेल की कीमतों में जल्द स्थिरता नहीं आई, तो आने वाले महीनों में लागत और बढ़ने की आशंका है। प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती … एक ओर जनता को समय पर परियोजनाएं सौंपने का दबाव है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती लागत और संसाधनों की कमी बड़ी चुनौती बन चुकी है। विभागीय स्तर पर स्थिति का आकलन किया जा रहा है, ताकि बढ़ती कीमतों और समयसीमा के बीच संतुलन बनाया जा सके। स्पष्ट है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का असर अब स्थानीय विकास कार्यों तक पहुंच चुका है। यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो शहर और प्रदेश में चल रहे कई महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों की रफ्तार और धीमी हो सकती है। सुनील साहू / शहबाज / 02 अप्रैल 2026