पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है। विधानसभा चुनावों के पूर्व एसआईआर की प्रक्रिया पिछले कई माह से चल रही है। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका की सुनवाई भी चल रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस तरह से एसआईआर को लेकर आर-पार की लड़ाई लड़ रही हैं, दीदी चुनाव आयोग और भाजपा के लिए एक बड़ा सिर दर्द बन गई हैं। चुनाव आयोग का एसआईआर का खेल बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान विपक्ष ने समझ लिया है। फॉर्म नंबर 6 और 7 का जो खेल चुनाव आयोग में चल रहा है, उसे भी विपक्षी दलों और ममता बनर्जी ने पहचान लिया है। जिस तरह से केंद्रीय चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में शीर्ष अधिकारियों से लेकर बीएलओ तक के ट्रांसफर किए हैं। इस मामले में ममता बनर्जी और उनके अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को उठाया है। न्याय पालिका में ममता बनर्जी ने लड़ाई लड़ने में कोई कोताही नहीं बरती। निश्चित रूप से चुनाव आयोग को जो संवैधानिक संरक्षण और सरकार का संरक्षण प्राप्त है, उसको देखते हुए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ममता दीदी को कोई लाभ नहीं मिला है। इसके बाद भी पूरी तरह से जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं, एक धर्म विशेष के लोगों में जब हाईकोर्ट के जज का नाम भी कट गया, उसके बाद यह मामला जनता के बीच बड़ी तेजी के साथ पहुंच गया है। हाल ही में न्यायिक अधिकारी ब्लॉक ऑफिस में बैठकर जिन मतदाताओं के नाम नहीं जुड़े थे, उनकी शिकायतों पर जांच कर रहे थे। उन न्यायिक अधिकारियों को मतदाताओं ने कई घंटे तक बंधक बना कर रखा। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पूरी रात जागकर प्रशासन को जागाना पड़ा। उसके बाद बंधक जजों को बाहर निकाला जा सका। सुप्रीम कोर्ट को स्वंय संज्ञान लेकर आदेश करना पड़ा। सीआरपीएफ को न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा ड्यूटी में लगाया जाए। इस मामले में पहले ही टीएमसी ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए यह कह दिया था। जिस बड़े पैमाने पर अधिकारियों के ट्रांसफर केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा बिना राज्य सरकार के परामर्श के किए गए हैं, उसके बाद राज्य सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद केंद्रीय चुनाव आयोग के द्वारा नियुक्त प्रशासन काम कर रहा है। कानून व्यवस्था की पश्चिम बंगाल में स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। जिन मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, उनकी संख्या लाखों में है। वह अपने नाम जुड़वाने के लिए आक्रोषित होकर स्थानीय अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों के पास पहुंच रहे हैं। हरियाणा, महाराष्ट्र तथा बिहार के चुनाव में जिस तरह से फॉर्म 6 एवं 7 का दुरुपयोग किया गया था। जिस तरह से चुनाव में मतदाताओं के नाम जोड़ने और काटने का खेल अंतिम समय पर चुनाव आयोग द्वारा खेला गया है, इसका खुलासा पूरी तरह से हो चुका है। राहुल गांधी ने जब पत्रकार वार्ता कर चुनाव आयोग के ऊपर सबूतों के साथ आरोप लगाए थे, उस समय विपक्ष ने चुप्पी साध ली थी। चुनाव आयोग की गड़बडि़यों का सबसे पहले खुलासा राहुल गांधी ने किया था। चुनाव आयोग ने अभी तक उस पत्रकार वार्ता के आरोपों का जवाब नहीं दिया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और टीएमसी के नेता सड़क से लेकर अदालत तक चुनाव आयोग के खिलाफ लड़ाई लड़ते चले आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल अधिकारों के प्रति काफी जागरूक रहता है। इस चुनाव में भाजपा को पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ा रहा है। टीएमसी का नेटवर्क गांव-गांव तक फैला हुआ है। जिस तरह से टीएमसी चुनाव आयोग के हर गड़बड़ी को उजागर कर रही है। चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर एसआईआर में गड़बड़ी होने पर कोर्ट पहुंच जाती है। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग और भाजपा को दस्तावेजी सबूतों के साथ बुरी तरह से घेर लिया है। पश्चिम बंगाल पहला राज्य होगा, जहां चुनाव आयोग के कारण भाजपा को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल चर्चाओं में है, केंद्रीय चुनाव आयोग के ज्ञानेश कुमार भाजपा के लिए भस्मासुर साबित हो सकते हैं। चुनाव आयोग के ऊपर आरोप लग रहे हैं, वह भाजपा नेताओं के इशारे पर उनके मनपसंद अधिकारियों और कर्मचारियों को चुनाव कार्य में लगा रहे हैं। चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसका ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ दिया है। कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होने पर ममता दीदी ने चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। रही-सही कसर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेश पर जो न्यायिक अधिकारी मतदाता सूची के काम में लगे हुए हैं, उनको बंधक बनाए जाने के बाद प. बंगाल में किस तरह की कानून व्यवस्था है, यह सुप्रीम कोर्ट के सामने उजागर हो गया है। पश्चिम बंगाल में अभी मतदाता सूची फाइनल नहीं हुई है जल्द ही नामांकन भरने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ेगा, पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था की स्थिति को वर्तमान व्यवस्था में नियंत्रित कर पाना आसान नहीं होगा। ममता बनर्जी की सरकार को चुनाव आयोग ने पूरी तरह से अलग-थलग करके रखा है। ऐसी स्थिति में पश्चिम बंगाल के चुनाव में जो भी हिंसा होगी या कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ेगी, उसके लिए चुनाव आयोग और भाजपा को जिम्मेदार ठहराना ममता बनर्जी के लिए आसान हो गया है। एसआईआर में जो गड़बड़ियां हुई हैं, वह सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में आ गई है। यह सही है कि कानूनन केंद्रीय चुनाव आयोग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उनके ऊपर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। जिस तरह से पश्चिम बंगाल की जनता उत्तेजित हो रही है। उसका खामियाजा कहीं ना कहीं केंद्रीय चुनाव आयोग और भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। इस सारे खेल में न्याय पालिका की साख एवं लाखों मतदाताओं के मौलिक नागरिक अधिकार दांव पर लगे हैं। इसका खामियाजा भाजपा को ही भुगतना पड़ेगा। चुनाव आयोग कुछ समय बाद चला जायेगा। स्थाई प्रभाव भाजपा पर पड़ेगा। सनत कुमार जैन/ईएमएस/04 अप्रैल2026