लेख
05-Apr-2026
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मेरे घर के सामने खड़ा था वो पेड़- सिर्फ पेड़ नहीं, मेरी उम्र का साक्षी था। उसकी छाँव में बचपन ने आँख-मिचौली खेली, जवानी ने सपनों की गठरी खोली, और बुढ़ापे ने थोड़ी राहत की साँस ली। सुबह की सैर का साथी, दोपहर की थकान का आसरा, शाम की बैठकों में खामोश मगर अपना सा चेहरा। जब भी बारिश आती, मैं और वो- दोनों भीगते थे साथ, जैसे कोई पुराना रिश्ता बिना शब्दों के मुस्कुराता हो। मगर एक दिन शहर की योजनाएँ आईं- सीमेंट की सड़क, टेलीफोन के तारों का जाल, नल के लिए गड्ढे... सबको अपनी-अपनी जल्दी थी, और वो पेड़ सबकी राह में रुकावट बन गया। किसी ने नहीं देखा उसकी जड़ों में उलझी मेरी यादें, किसी ने नहीं सुना उसकी पत्तियों में छिपी मेरी हँसी। फिर चली एक आरी- धड़ाम से गिरा वो, और मेरे भीतर कुछ हमेशा के लिए टूट गया। अब वहाँ सिर्फ एक ठूंठ खड़ा है- सूखा, खामोश, जैसे कोई अधूरी कहानी। लोग गुजरते हैं बेखबर, पर मैं जब भी देखता हूँ उसे, मुझे अपना ही एक हिस्सा जड़ से कटा हुआ लगता है। वो पेड़ नहीं था, मेरा अपना था- और अब मेरे सामने खड़ा है मेरा ही दर्द… एक ठूंठ बनकर। ईएमएस / 05 अप्रैल 26