ईरान से इजरायल-अमेरिका सैन्य संघर्ष के चलते पिछले 35 दिनों में भारत की अर्थव्यवस्था एवं जिस तरह से महंगाई और बेरोजगारी की मार पड़ी है उससे मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है। एलपीजी के दाम पहले ही बढ़ाए जा चुके हैं बावजूद इसके लोगों को रसोई गैस नहीं मिल पा रही है, जिसके कारण उनका जीवन बहुत कष्टप्रद हो गया है। हर चीज के दाम बढ़ते चले जा रहे हैं। गैस एवं पेट्रोल-डीजल के कारण देश में हजारों फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं। आईटी कंपनियों के बाद अब देश के विभिन्न हिस्सों में जो छोटी-छोटी फैक्ट्रियां चल रहीं थीं, जिनमें सैकड़ो मजदूर काम करते थे उन्हें भी निकाला जा रहा है। पिछले 35 दिनों से निर्यात एक तरह से बंद है। कच्चा माल फैक्ट्री को मिल नहीं रहा है। रही सही कसर पेट्रोल डीजल पूरी कर रहे हैं, जिसके कारण लघु एवं मध्यम उध्यम भी तेजी के साथ बंद होते चले जा रहे हैं। विभिन्न राज्यों से रोजाना हजारों की संख्या में मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है। खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ गए हैं। देश में लाखों छोटे-छोटे होटल और ढाबे बंद हो गए हैं। शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। सोने-चांदी के भाव में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। कुल मिलाकर देश में जिस तरह की स्थिति बनती जा रही है यह ठीक कोरोना काल की तरह नजर आ रही है। उस समय भी लगभग सब कुछ ठहर गया था। कुछ इसी तरह की स्थिति अब देखने को मिल रही है। सरकार और राजनीतिक दल चुनाव लड़ने में व्यस्त हैं। जनता हैरान और परेशान होकर घूम रही है। सरकार सच भी नहीं बता रही है। ऐसी स्थिति में लोगों में घबराहट का माहौल बनता जा रहा है। वो करे भी तो क्या करे। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर अचानक हमला किया गया था। इन हमलों में ईरान के 40 से अधिक प्रमुख नेता और सैन्य प्रमुख मारे जा चुके हैं। इसका जिस तरह से ईरान ने जवाब दिया है उसने सारी दुनिया को भयाक्रांत करके रख दिया है। अमेरिका और इजरायल जैसे देश ईरान का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। इन दोनों देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस युद्ध का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस एवं खाद पर पड़ा है। पिछले एक महीने से दिनों-दिन स्थिति खराब होती चली जा रही है। अब तो यह भी आशंका व्यक्त की जाने लगी है, कि पेट्रोल-डीजल और गैस के बाद अब सारी दुनिया को खाद के संकट का सामना पड़ेगा। वर्तमान में खाद्य उत्पादन मात्र 50 फ़ीसदी रह गया है। यदि खाद्य संकट और उत्पन्न हो गया तो सारी दुनिया एक बार फिर 60 और 70 के दशक में लगभग अकाल की स्थिति में पहुंच जाएगी। दुनिया के आधे से ज्यादा देशों में दो टाइम का भोजन भी लोगों को मुहैया नहीं होगा। सारी दुनिया के अर्थशास्त्री वैश्विक मंदी की चिंता जाता रहे हैं। सारी दुनिया के देश भारी कर्ज में फंसे हुए हैं। जनता के ऊपर भी कर्ज है। ऐसी स्थिति में मांग कम होगी जिसके कारण आर्थिक संकट बड़ी तेजी के साथ दुनिया में बढ़ेगा। इसको लेकर अब लोग चिंता व्यक्त कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह की दादागिरी सारी दुनिया के देशों से करने की कोशिश की उसके बाद अमेरिका का विश्वास अब दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष नहीं कर रहे हैं। जिस तरह से डॉलर मुद्रा को लेकर अमेरिका दादागिरी कर रहा था वर्तमान युद्ध ने पहली बार अमेरिका को बचाव की मुद्रा में खड़ा होता हुआ देखा है। इसके बाद भी ट्रंप और नेतन्याहू का अहंकार सिर चढ़कर बोल रहा है। इन दोनों देशों ने जिस तरह से ईरान को बर्बाद करने की कोशिश की, उनके धर्मगुरु सुप्रीमो अयातुल्लाह खामेनेई सहित तीन दर्जन से अधिक ईरान के महत्वपूर्ण नेताओं की हत्या की, उसके कारण ईरान भी अब अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा है। सारी दुनिया के देश पेट्रोल डीजल रसोई गैस और खाद की किल्लत से जूझ रहे हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए भारत सरकार को गंभीरता के साथ इस स्थिति पर विचार करना होगा। जनता को सच बताना होगा। भारत इन स्थितियों से किस तरह से निपटाने की तैयारी कर रहा है या जनता को क्या करना चाहिए, जो इस विषम परिस्थिति का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ सके, इसके लिए सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। चुनाव जीतने से ज्यादा इस समय पक्ष और विपक्ष का एक होना जरूरी है। इस संकट में सभी लोग मिलकर जब स्थितियों का मुकाबला करेंगे तभी जाकर समस्याओं का समाधान हो पाएगा। सरकार को इस दिशा में पहल करने की जरूरत है। इसमें विलंब होगा तो देश की स्थिति बहुत खराब हो सकती है। इसका असर कानून व्यवस्था पर पड़ सकता है। भुखमरी और खाद्य संकट से भी भारत को जूझना पड़ सकता है। जिस तरह से आर्थिक महामंदी की चेतावनी आर्थिक विशेषज्ञ दे रहे हैं। इस ओर सरकार को युद्ध स्तरीय तैयारी के साथ उतरना होगा। एकजुटता प्रदर्शित करनी होगी। बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के योग्य व्यक्तियों को जिम्मेदारी देने का काम सरकार को ही करना पड़ेगा। ईएमएस/ 05 अप्रैल 26