05-Apr-2026
...


:: मुख्यमंत्री डॉ. यादव की पहल : उज्जैन के बाद अब बाबा विश्वनाथ की नगरी में गूंजेगी भारतीय कालगणना :: वाराणसी//इंदौर (ईएमएस)। कालगणना की पावन नगरी और ‘महाकाल’ के केंद्र उज्जैन से प्रस्फुटित हुई भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा अब बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में भी जीवंत हो उठी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की विशेष पहल पर, भारतीय कालगणना के सिद्धांतों पर आधारित विश्व की प्रथम ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’ को उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर प्रांगण में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने 3 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बाबा काशी विश्वनाथ के चरणों में यह घड़ी भेंट की थी। तत्पश्चात, विक्रम संवत् 2083, वैशाख कृष्ण पक्ष की द्वितीया (4 अप्रैल, 2026) को इसे मंदिर परिसर में पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ प्रतिष्ठापित किया गया। यह मध्य प्रदेश सरकार के उस सांस्कृतिक संकल्प की ओर एक बड़ा कदम है, जिसके तहत देश के सभी ज्योतिर्लिंगों और अयोध्या के श्रीराम मंदिर में भी वैदिक घड़ी स्थापित की जानी है। :: प्राचीन विज्ञान और आधुनिक तकनीक का संगम :: उज्जैन स्थित ‘महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ’ द्वारा विकसित यह घड़ी महज समय बताने वाला यंत्र नहीं, बल्कि भारत के प्राचीन वैज्ञानिक वैभव का डिजिटल पुनर्जागरण है। यह घड़ी सूर्योदय के साथ परिचालित होती है और एक पूर्ण दिवस को 30 मुहूर्तों में विभाजित करती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह स्थान-विशिष्ट सूर्योदय और सूर्यास्त के आधार पर समय की सटीक गणना करती है। इस घड़ी के माध्यम से श्रद्धालु और युवा पीढ़ी न केवल भारतीय मानक समय जान सकेंगे, बल्कि पंचांग, तिथि, योग, नक्षत्र, भद्रा स्थिति और ग्रहों के गोचर जैसी सूक्ष्म खगोलीय जानकारियों से भी रूबरू हो सकेंगे। :: सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटल पुनरुद्धार :: मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार अपनी सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक तकनीक के साथ सहेजने के लिए निरंतर प्रयासरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 29 फरवरी 2024 को उज्जैन में इस वैदिक घड़ी का लोकार्पण किया गया था, जिसके बाद अब इसका विस्तार अन्य पावन धामों तक किया जा रहा है। यह नवाचार हमारे गौरवशाली अतीत को वर्तमान से जोड़ते हुए युवाओं को अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा दे रहा है। महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ द्वारा निर्मित यह घड़ी भारत की प्राचीन कालगणना परंपरा को वैश्विक पटल पर पुनर्स्थापित करने का एक अभिनव और सफल प्रयास सिद्ध हो रही है। प्रकाश/5 अप्रैल 2025