नई दिल्ली(ईएमएस)। दुनिया की सबसे ऊंची शिव प्रतिमा से लेकर नए संसद भवन की दीवारों पर उकेरी गई कलाकृतियों तक, भारतीय शिल्पकार नरेश कुमावत कला की दुनिया में एक ऐसा नाम बन चुके हैं जिनकी कला 80 से अधिक देशों में जीवंत है। राजस्थान के पिलानी में जन्मे नरेश कुमावत ने हाल ही में मार्च 2026 में राजस्थान के नाथद्वारा में हनुमान जी की 132 फीट ऊंची प्रतिमा का निर्माण कर एक और कीर्तिमान स्थापित किया है। उनके काम की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अब तक 3000 से ज्यादा मूर्तियां बना चुके हैं। नरेश कुमावत की सफलता की कहानी जितनी भव्य है, उसका सफर उतना ही संघर्षपूर्ण रहा है। कला उन्हें विरासत में मिली थी; उनके पिता मातु राम एक शिक्षक और मूर्तिकार थे, जिन्होंने दिल्ली एयरपोर्ट के पास प्रसिद्ध शिव प्रतिमा बनाई थी, जबकि उनके दादा हनुमान प्रसाद देश के जाने-माने वास्तुकार थे। विरासत होने के बावजूद नरेश ने अपनी पहचान खुद बनाने का संकल्प लिया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत देश की बड़ी म्यूजिक कंपनी टी-सीरीज के स्टूडियो में महज 60 रुपये की दिहाड़ी पर एक मजदूर के रूप में की थी। वहां उनकी मेहनत और लगन देखकर गुलशन कुमार ने उन्हें आगे बढ़ने में काफी सहयोग दिया। नरेश कुमावत का कद आज इतना ऊंचा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माता हीराबेन मोदी और उनके पिता की मूर्तियां भी उन्होंने ही तैयार की हैं। प्रधानमंत्री ने अपनी मां की वह प्रतिमा आज भी अपने दिल्ली स्थित आवास पर सहेज कर रखी है। देश ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी मांग है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए मूर्तियां बनाने से लेकर मॉरीशस में 108 फीट ऊंचे भगवान शंकर और मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाने का श्रेय उन्हें जाता है। वर्तमान में उनके उल्लेखनीय कार्यों में लखनऊ का प्रेरणा स्थल शामिल है, जहां श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी की 65 फीट ऊंची मूर्तियां स्थापित हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में बाबा साहेब अंबेडकर की 206 फीट ऊंची प्रतिमा भी उनकी बेजोड़ शिल्पकला का प्रमाण है। नरेश कुमावत अब हनुमान जी की एक और विशाल 202 फीट ऊंची मूर्ति पर काम कर रहे हैं, जिसका उद्घाटन जून 2026 तक होने की संभावना है। अपनी जड़ों को न भूलते हुए उन्होंने अपने स्टूडियो का नाम अपने पिता के नाम पर रखा है, जहां वे आधुनिक सिलिकॉन मूर्तियों के साथ-साथ पारंपरिक शिल्प को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं। वीरेंद्र/ईएमएस 08 अप्रैल 2026