लेख
08-Apr-2026
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- सियासी रण में पांच राज्य: सत्ता की कुर्सी किसके नाम? पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों ने देश की राजनीति को उबाल पर ला दिया है। केरल से लेकर असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी तक सियासी हलचल अपने चरम पर है। रैलियों की गूंज, वादों की बरसात और आरोप-प्रत्यारोप के तीखे तीरों के बीच लोकतंत्र का यह उत्सव अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। हर राजनीतिक दल अपने-अपने एजेंडे, घोषणापत्र और रणनीति के साथ मैदान में है और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है। इस बार का चुनाव केवल सरकार बनाने का साधन नहीं बल्कि बीते पांच वर्षों के कामकाज का जनमत संग्रह और आने वाले राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाला निर्णायक क्षण है। इन पांच राज्यों की कुल 824 विधानसभा सीटों पर लगभग 17.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं बल्कि 116 लोकसभा सीटों के प्रभाव क्षेत्र से जुड़ा हुआ वह राजनीतिक रणक्षेत्र है, जो राष्ट्रीय राजनीति की धुरी को प्रभावित कर सकता है। चुनाव कार्यक्रम भी बेहद दिलचस्प है, असम, केरल और पुदुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान होगा, तमिलनाडु में 23 अप्रैल को और पश्चिम बंगाल में दो चरणों (23 और 29 अप्रैल) में वोट डाले जाएंगे। नतीजे 4 मई को घोषित होंगे और उसी दिन यह स्पष्ट हो जाएगा कि जनता ने किसके पक्ष में अपना विश्वास व्यक्त किया। इस बार का चुनावी परिदृश्य कई स्तरों पर जटिल और बहुआयामी है। सत्ताधारी दल जहां अपने विकास कार्यों, कल्याणकारी योजनाओं और ‘डबल इंजन’ जैसे नारों के सहारे जनता तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक असमानता और प्रशासनिक खामियों को मुद्दा बनाकर आक्रामक रुख अपनाए हुए है। यह संघर्ष अब केवल सत्ता का नहीं रहा बल्कि विचारधारा, नीतियों और विकास के मॉडलों की प्रतिस्पर्धा में बदल चुका है। सबसे अधिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है पश्चिम बंगाल, जहां राजनीतिक तापमान सबसे ज्यादा है। 294 सीटों वाली विधानसभा में 6.44 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत हासिल कर सत्ता पर कब्जा बनाए रखा था जबकि भाजपा ने मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। इस बार मुकाबला और अधिक तीखा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस अपने ‘बंगाल मॉडल’, महिला सशक्तिकरण योजनाओं और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों के साथ मैदान में है, वहीं भाजपा ‘डबल इंजन’ सरकार के वादे और घुसपैठ जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रही है। रोजगार, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे मुद्दे भी चुनावी विमर्श के केंद्र में हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यहां मुकाबला बेहद कांटे का होगा, एक तरफ ममता बनर्जी की राजनीतिक विरासत दांव पर है तो दूसरी ओर भाजपा के लिए यह पूर्वी भारत में विस्तार का सुनहरा अवसर है। असम का चुनाव भी कम दिलचस्प नहीं है। 126 सीटों वाली विधानसभा में 2.25 करोड़ मतदाता निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यहां मुख्य सवाल यही है कि क्या भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी कर पाएगी या कांग्रेस और उसके सहयोगी दल वापसी का रास्ता तैयार करेंगे। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा विकास, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा के मुद्दों को लेकर जनता के बीच है। वहीं विपक्ष सीएए-एनआरसी, बेरोजगारी और क्षेत्रीय पहचान जैसे मुद्दों को उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की सक्रियता ने इस चुनाव को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। असम में परिणाम न केवल राज्य की राजनीति बल्कि पूर्वोत्तर भारत में शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेंगे। दक्षिण भारत में तमिलनाडु और केरल की राजनीति अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का प्रभाव इतना गहरा है कि राष्ट्रीय दलों की भूमिका सीमित हो जाती है। 234 सीटों वाली विधानसभा में 5.67 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे। पिछले चुनाव में डीएमके गठबंधन ने सत्ता हासिल की थी और इस बार भी वह अपने ‘द्रविड़ मॉडल’, सामाजिक न्याय और कल्याणकारी योजनाओं के दम पर मैदान में है। वहीं एआईएडीएमके गठबंधन महंगाई, बिजली संकट और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार पर हमला बोल रहा है। इसके अलावा अभिनेता विजय की पार्टी का चुनावी मैदान में उतरना एक नया समीकरण बना सकता है, खासकर युवा मतदाताओं के बीच। केरल में 140 सीटों के लिए 2.7 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे। यहां का चुनाव पारंपरिक रूप से सत्ता परिवर्तन के लिए जाना जाता रहा है लेकिन पिछले चुनाव में वाम मोर्चे ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया था। इस बार यदि वह तीसरी बार सत्ता में आता है तो यह एक नया राजनीतिक अध्याय होगा। वाम मोर्चा अपने स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के मॉडल को प्रमुखता दे रहा है जबकि कांग्रेस नेतृत्व वाला यूडीएफ महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर हमलावर है। भाजपा भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में है, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय होता जा रहा है। पुदुचेरी भले ही छोटा केंद्र शासित प्रदेश हो, लेकिन यहां की राजनीति बेहद संवेदनशील और निर्णायक है। 30 सीटों वाली विधानसभा में 9.44 लाख मतदाता मतदान करेंगे। यहां गठबंधन राजनीति का महत्व सबसे अधिक है, जहां छोटे-छोटे वोट अंतर भी सत्ता की दिशा तय कर सकते हैं। पिछले चुनाव में एनडीए गठबंधन ने सत्ता हासिल की थी और इस बार भी वह अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल सत्ता वापसी के लिए संघर्षरत हैं। इन सभी राज्यों में एक समान बात यह है कि वोट प्रतिशत और सीटों का समीकरण हमेशा सीधा नहीं होता। कई बार मामूली वोट अंतर भी भारी सीट अंतर में बदल जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल बूथ स्तर तक अपनी रणनीति को मजबूत कर रहे हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार ने चुनावी अभियान को एक नई दिशा दी है, जहां नैरेटिव की लड़ाई केवल मैदान में नहीं बल्कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी लड़ी जा रही है। चुनावी मुद्दों की बात करें तो इस बार कोई एक मुद्दा हावी नहीं है। रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि संकट और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दे अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रूप में सामने आ रहे हैं। यही विविधता इन चुनावों को और अधिक जटिल और रोचक बनाती है। राजनीतिक दृष्टि से इन चुनावों को 2029 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल भी माना जा रहा है। इन राज्यों से आने वाली 116 लोकसभा सीटें राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। यदि भाजपा असम में अपनी पकड़ बनाए रखती है, पश्चिम बंगाल में बेहतर प्रदर्शन करती है और दक्षिण भारत में अपनी उपस्थिति मजबूत करती है, तो उसकी राष्ट्रीय स्थिति और सुदृढ़ हो सकती है। वहीं, यदि तृणमूल कांग्रेस बंगाल में अपनी सत्ता बरकरार रखती है तो ममता बनर्जी विपक्षी राजनीति की प्रमुख धुरी बनी रह सकती हैं। केरल में वाम मोर्चे की जीत वामपंथी राजनीति के लिए नई ऊर्जा लेकर आएगी जबकि तमिलनाडु में डीएमके की निरंतरता द्रविड़ राजनीति की दिशा तय करेगी। कुल मिलाकर, यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं बल्कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा है। मतदाता इस बार खामोश जरूर हैं लेकिन उनकी चुप्पी के भीतर गहराई से सोच-विचार और निर्णय की प्रक्रिया चल रही है। 4 मई को जब परिणाम सामने आएंगे, तभी यह स्पष्ट होगा कि किसने जनता की अपेक्षाओं को समझा और किसे आत्ममंथन की आवश्यकता है। लोकतंत्र का यह महापर्व एक बार फिर यह सिद्ध करने जा रहा है कि अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है और वही निर्णय देश की राजनीति की दिशा और दशा तय करता है। (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं) ईएमएस / 08 अप्रैल 26