मध्य पूर्व पर एक बार फिर दुनिया की टकटकी लगी हुई है, क्योंकि 40 दिनों के भीषण युद्ध और तनाव के बाद अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीस एक अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बन गयी है, जो निःसंदेह पूरी दुनिया के लिए राहत और सुकून देने वाली बात है। यही कारण है कि विनाशकारी संघर्ष के बाद संघर्षविराम की घोषणा का चौतरफा स्वागत किया जा रहा है। इसका कारण है कि यह केवल एक सैन्य ठहराव नहीं, बल्कि वैश्विक अस्थिरता के बीच एक संभावित संतुलन की शुरुआत भी है। हालांकि यह राहत अस्थायी है, लेकिन इसके दूरगामी प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन सीज फायर के एलान के बाद भी इजरायल के लेबनान पर जबरदस्त हमले और अमेरिका का लेबनान को सीज फायर के बाहर बताना दूसरी ओर ईरान का लेबनान को अकेले छोड़ने से साफ इंकार करना सीज फायर की सफलता पर सवाल खड़े कर रहा है। वैसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने चालीस दिन के भीतर जिस तरह हर सुबह दोपहर शाम अलग-अलग रवैया और बयानबाजी की है वह बताता है कि ट्रंप को लेकर विश्व गंभीर नहीं है और ट्रंप की घोषणा कथनी और करनी पर यकीन करना भूल हो सकता है। आपको बता दें कि इस संघर्षविराम की पृष्ठभूमि बेहद तनावपूर्ण रही, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को धमकी दी थी कि दुनिया से नामोनिशान मिटा देंगे। यह विनाशकारी चेतावनी थी, जिसके बाद स्थिति काफी चरम पर पहुंच गयी थी। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर दी गई समय-सीमा जैसे-जैसे समाप्ति की ओर बढ़ रही थी, वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता और भय बढ़ता जा रहा था। ऐसे में अंतिम समय में लिया गया संघर्षविराम का निर्णय न केवल कूटनीतिक जीत है, बल्कि एक संभावित बड़े युद्ध को टालने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी है। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि यह संघर्ष विराम किसी सामान्य शांति समझौते का परिणाम नहीं है, बल्कि एक विशेष उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने से जुड़ा हुआ है। इसका सीधा अर्थ है कि यह सीजफायर शर्तों पर आधारित है, और इन शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में संघर्ष तुरंत फिर से भड़क सकता है। दूसरी ओर इजरायल की प्रतिक्रिया इस पूरे मामले को और अधिक स्पष्ट करती है। इजरायल ने जहां अमेरिका के फैसले का समर्थन किया है, वहीं उसने यह भी साफ कर दिया है कि यह समझौता ईरान की रातों पर नहीं हुआ है। यह बयान केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संदेश है कि क्षेत्र में शाक्ति संतुलन किस दिशा में झुका हुआ है। इजरायल का यह रुख बताता है कि यह इस सीजफायर को स्थायी समाधान के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि इसे एक अस्थायी रणनीतिक अस्थायी रणनीतिक ठहराव मानता है। उसकी नजरें लगातार ईरान की सैन्य गतिविधियों पर टिकी हुई हैं, और किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में वह फिर से आक्रामक रुख अपनाने के लिए तैयार है। ईरान की स्थिति भी कम दिलचस्प नहीं है। ईरान ने जहां अपने 10-सूत्री प्रस्ताव के जरिए प्रतिबंध हटाने और स्थायी शांति की बात की, वहीं उसने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी सैन्य तैयारी बरकरार है। हमारी उंगली ट्रिगर पर है जैसे बयान यह संकेत देते हैं कि ईरान इस संघर्ष विराम को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक अवसर के रूप में देख रहा है। भारत का रुख इस पूरे मामले में संतुलित और परिपक्व रहा है। नई दिल्ली ने इस युद्धविराम का स्वागत करते हुए साफ कहा है कि कूटनीति ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने जिस तरह भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया, चह इस बात का संकेत है कि भारत केवल वैश्विक राजनीति में नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के हितों की रक्षा में भी पूरी तरह सजग है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलु होमुंज जलडमरूमध्य रहा। स्टेट ऑफ होमुंज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मागों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसके बंद होने की आशंका ने पूरी दुनिया, खासकर भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों को गंभीर संकट में डाल दिया था। ईरान द्वारा इसे खोलने की सहमति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को तत्काल राहत प्रदान की है। इससे न केवल तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद है, बल्कि कीमतों में स्थिरता भी लौट सकती है। अमेरिका की ओर से यह दावा किया गया कि उसके सैन्य लक्ष्य पूरे हो चुके हैं, जबकि ईरान ने भी अपनी शर्तों को आंशिक रूप से मनवाने में सफलता हासिल की है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि दोनों पक्ष इस संघर्ष को अनिश्चितकाल तक खींचने के इच्छुक नहीं थे। घरेलू दबाव, आर्थिक प्रभाव और वैश्विक आलोचना इन सभी ने दोनों देशों को एक बीच का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर किया। इस संघर्षविराम के पीछे कूटनीतिक प्रयासों की भी बड़ी भूमिका रही है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर ने मध्यस्थ के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सांधे अमेरिकी नेतृत्व से बातचीत कर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की। इसके अलावा चीन का हस्तक्षेप भी निर्णायक साबित हुआ। चीन, जो ईरान का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है, ने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए ईरान को वार्ता के लिए तैयार किया। यह दर्शाता है कि आज की वैश्चिक राजनीति में बहुपक्षीय कूटनीति कितनी महत्वपूर्ण हो गई है। हालांकि संघर्षविराम के बावजूद क्षेत्रीय तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में इजरायल का रुख अभी भी सख्त बना बना हुआ है। इजरायल ने स्पष्ट किया है कि यह इस युद्धविराम को ईरान की शतों पर नहीं मानता और यदि ईरान ने किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि जारी रखी, तो वह तुरंत जवाब देगा। यह स्थिति बताती है कि क्षेत्र में शांति अभी भी नाजुक है और किसी भी समय हालात फिर से बिगड़ सकते हैं। भारत के लिए यह घटनाक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर मध्य पूर्व पर निर्भर है। होर्मुज जलमार्ग के खुलने से भारत में तेल और गैस की आपूर्ति पर मंडरा रहा संकट टल गया है। भारत सरकार ने इस संघर्षविराम का स्वागत करते हुए स्पष्ट किया है कि कूटनीति ही किसी भी संपर्ष का स्थायी समाधान है। भारतीय विदेश मंत्रालय का यह रुख भारत की पारंपरिक नीति को दर्शाता है, जिसमें शांति और संवाद को प्राथमिकता दी जाती है। इसके साथ ही भारत ने अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। मध्य पूर्व में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और किसी भी संघर्ष का सीधा असर उन पर पड़ता है। सरकार द्वारा जारी एडवाइजरी और सहायता प्रयास इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर सजग है। इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका प्रभाव है। युद्ध की स्थिति में तेल की कीमतों में तेजी से वृद्धि होती वृद्धि होती है, जिससे पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ती है। भारत जैसे जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। संपर्षविराम के बाद कीमतों में स्थिरता की उम्मीद ने आर्थिक मोर्चे पर भी राहत प्रदान की है। फिर भी, यह समझना जरूरी है कि यह संघर्षविराम केवल एक अस्थायी समाधान है। 14 दिनों की अवधि में स्थायी शांति की दिशा में ठोस कदम उठाना अत्यंत आवश्यक होगा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रतिबंधों जैसे मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं। यदि इन मुद्दों पर ठोस प्रगति नहीं होती, तो यह संघर्ष फिर से भड़क सकता है। वर्तमान स्थिति यह भी संकेत देती है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और वैश्विक सहयोग का मिश्रण है। अमेरिका, ईरान, इजरायल, पाकिस्तान और चीन इन सभी देशों की भूमिका यह दर्शाती है कि कोई भी देश अकेले इस तरह के संकट को हल नहीं कर सकता। अंततः, यह संघर्षविराम एक अवसर है, एक ऐसा अवसर जिसे स्थायी शांति में बदलना होगा। दुनिया पहले ही कई संकटों का सामना कर रही है आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनाव। ऐसे में एक और बड़े बुद्ध की संभावना पूरी मानवता के लिए विनाशकारी हो सकती है। उम्मीद यही है कि आने चाले दिनों में सभी पक्ष संयम और समझदारी का परिचय देंगे। कूटनीति को प्राथमिकता देते हुए एक स्थायी समाधान की दिशा में कदम बढ़ाएंगे, क्योंकि अभी तक सारा मामला दादागिरी और वैश्विक शक्ति प्रदर्शन का अधिक मालूम पड़ रहा है। विश्व में यह एक नया आतंकवाद है जिस को शक्ति संपन्न देश सामंतवादी तौर पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) ईएमएस / 11 अप्रैल 26