लेख
12-Apr-2026
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नॉर्थ-ईस्ट की हरियाली जैसे किसी कवि का शांत स्वप्न हो-भीगी हुई धरती, दूर तक फैले वृक्ष, और टीन की छत पर गिरती बारिश की बूंदों की अनवरत धुन। इसी सौम्य वातावरण में साहिल अपनी जिंदगी जी रहा था। पैरामिलिट्री फोर्स का एक अनुशासित और जिम्मेदार अधिकारी, जिसकी पहचान उसके कर्तव्य से थी, पर जिसकी आत्मा अपने परिवार में बसती थी।पत्नी और दो बच्चों के साथ वह एक किराए के घर में रहता था। कैंप में आवास की कमी थी, लेकिन उस घर में उसे कभी परायापन महसूस नहीं हुआ। मकान मालिक का व्यवहार इतना आत्मीय था कि वह एक रिश्तेदार जैसा लगने लगा था। घर में बच्चों की हंसी, पत्नी की स्नेहभरी उपस्थिति और शाम को साहिल का लौटना-सब मिलकर उस घर को एक जीवंत संसार बना देते थे।सुबहें अनुशासन से शुरू होतीं और शामें अपनत्व में ढल जातीं। कभी पूरा परिवार शहर की ओर खरीदारी के लिए निकल पड़ता, जो करीब सत्रह किलोमीटर दूर था, तो कभी हवाई अड्डे की ओर टहलते हुए जीवन के छोटे-छोटे सुखों को समेट लेता। बारिश की बूंदें जब टीन की छत पर गिरतीं, तो साहिल देर तक उन्हें सुनता रहता-मानो समय उसी लय में थम गया हो।ऐसे ही साढ़े तीन वर्ष बीत गए-शांत, सहज और संतोषपूर्ण।पर जीवन स्थिर नहीं रहता।एक दिन अचानक आदेश आया-ट्रांसफर, जम्मू-कश्मीर।यह नाम सुनते ही साहिल के भीतर एक हल्की आशंका ने जन्म लिया। परिस्थितियां, अनिश्चितता और परिवार की सुरक्षा-इन सबने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया। अंततः उसने एक कठिन निर्णय लिया-परिवार को गृहनगर भेज देना। बच्चों का दाखिला वहां करा दिया गया और पत्नी भी प्रतियोगी परीक्षा की अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गई।अब वह अकेला था।वही घर, जो कभी हंसी से भरा रहता था, अब खामोशी से गूंजता था। दीवारें जैसे उससे बातें करना चाहती थीं, पर उसके पास सुनने वाला कोई नहीं था। दिन ड्यूटी में गुजर जाता, लेकिन रातें लंबी और बोझिल हो गईं। छुट्टियां जैसे किसी परीक्षा की तरह लगतीं। कभी मंदिर के पुजारी के पास बैठ जाता, कभी मकान मालिक के साथ कुछ पल बिता लेता-पर भीतर का खालीपन बना रहता।इसी बीच एक दिन खबर आई-प्रशासनिक कारणों से ट्रांसफर रुक गया है।क्षणभर के लिए उसके चेहरे पर प्रसन्नता आई, लेकिन तुरंत ही एक गहरी उदासी ने उसे घेर लिया। अब तो उसका परिवार उससे दूर अपने गृहनगर जा चुका था। जैसे जीवन ने उसे एक साथ राहत और रिक्तता दोनों दे दी हों।और तभी, नियति ने एक और परीक्षा ली।सितंबर की एक उमस भरी शाम, साहिल पार्क में टहल रहा था। पेड़ों की छाया धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। अचानक उसे अपने पैर में तीखी चुभन महसूस हुई। उसने नीचे देखा-एक सांप झाड़ियों में विलीन हो रहा था।उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।उसने तुरंत अपने कैंप के मेडिकल साथी रामबीर को बुलाया और कुछ ही देर में अस्पताल पहुंचा दिया गया। शुरुआत में सब सामान्य लगा, लेकिन रात के साथ स्थिति गंभीर होती गई। सांस भारी होने लगी, पैर में असहनीय दर्द था और भीतर एक अजीब-सी घबराहट-जैसे जीवन धीरे-धीरे हाथ से निकल रहा हो।उसने डॉक्टर को बुलाने को कहा, पर जिस डॉक्टर के पास उसका इलाज था, वह उस समय वहां नहीं था। इंटर्न डॉक्टर थे, पर अनुभव की कमी हर क्षण को और कठिन बना रही थी।उस रात साहिल पूरी तरह अकेला था।उधर, घर पर खबर पहुंचते ही उसकी पत्नी और मां की दुनिया जैसे ठहर गई। 2500 किलोमीटर दूर बैठी पत्नी तुरंत उड़ान भरने को तैयार हो गई, लेकिन दूरी और समय उस रात को और भी लंबा बना रहे थे।अस्पताल के उस शांत, ठंडे कमरे में साहिल ने पहली बार जीवन को इतनी निकटता से महसूस किया।वह सोचने लगा-क्या वास्तव में वही जीवन था, जिसके पीछे वह भाग रहा था? क्या जिम्मेदारियों और उपलब्धियों के बीच उसने कुछ खो दिया था? उसे अपने बच्चों की हंसी सुनाई देने लगी, पत्नी की आंखों की चमक याद आई, मां का स्नेह उसके मन को छू गया। और तभी उसे एक गहरी सच्चाई का एहसास हुआ-जीवन की असली संपत्ति वे लोग हैं, जो हमारे साथ हैं, न कि वे उपलब्धियां, जिनके पीछे हम भागते रहते हैं।धीरे-धीरे दवाओं ने असर किया। सुबह की पहली किरण के साथ उसकी हालत में सुधार होने लगा। और दोपहर तक उसकी पत्नी उसके पास थी।जब साहिल ने उसे देखा, उसकी आंखों से आंसू बह निकले-यह भय के नहीं, बल्कि जीवन को पुनः पाने की कृतज्ञता के आंसू थे।पत्नी ने उसका हाथ थामकर कहा-जीवन हमें कभी-कभी रोककर यह याद दिलाता है कि वास्तव में महत्वपूर्ण क्या है… उस क्षण ने साहिल को बदल दिया।वह फिर से ड्यूटी पर लौटा, लेकिन अब उसका दृष्टिकोण बदल चुका था। उसने अपने परिवार को वापस अपने पास बुला लिया। कुछ ही समय में वही घर फिर से हंसी, जीवन और प्रेम से भर गया।अब साहिल हर छोटे पल को जीने लगा-बच्चों के साथ हंसना, पत्नी के साथ चाय पीना, और बारिश की बूंदों को महसूस करना।उसे समझ आ गया था कि जीवन केवल जीने का नाम नहीं, बल्कि उसे महसूस करने का नाम है। उस दिन साहिल मन ही मन यह सोच रहा था कि-जीवन अनिश्चित है, क्षणभंगुर है, और हमारी कल्पना से कहीं अधिक नाजुक है। हम सब कुछ नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन यह हमारे हाथ में है कि हम अपने जीवन को कैसे जीते हैं।रिश्ते, प्रेम और साथ बिताए गए पल ही जीवन का वास्तविक मूल्य हैं। .../ 12 अप्रैल /2026