लेख
13-Apr-2026
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मानव जीवन को यदि गहराई से समझा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि शरीर केवल भोग का साधन नहीं बल्कि धर्म साधना का आधार है। प्राचीन वचनों में कहा गया है कि शरीर ही धर्म का पहला साधन है। जब तक शरीर स्वस्थ और समर्थ है तभी तक मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है और आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसलिए शरीर की रक्षा और उसका संतुलन बनाए रखना प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम दायित्व बन जाता है। इसी संदर्भ में आहार का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जैसा आहार होगा वैसा ही विचार और व्यवहार भी होगा। आज के समय में आहार को लेकर अनेक प्रकार की भ्रांतियां समाज में फैली हुई हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि शरीर को बलवान बनाने के लिए मांसाहार आवश्यक है। यह धारणा केवल अज्ञान और भ्रम का परिणाम है। वास्तव में मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है और उसकी शारीरिक संरचना भी इस बात की ओर संकेत करती है कि वह शाकाहार के लिए अधिक उपयुक्त है। शाकाहार न केवल शरीर को आवश्यक पोषण देता है बल्कि मन को भी शुद्ध और शांत बनाए रखता है। इतिहास और परंपरा के अनेक उदाहरण इस सत्य को प्रमाणित करते हैं कि शाकाहार अपनाकर भी व्यक्ति अत्यंत शक्तिशाली और तेजस्वी बन सकता है। हमारे देश के अनेक महापुरुषों ने शाकाहार को अपनाकर न केवल आत्मिक ऊंचाई प्राप्त की बल्कि समाज को भी दिशा दी। उनके जीवन से यह स्पष्ट होता है कि शुद्ध आहार केवल शरीर को ही नहीं बल्कि आत्मा को भी पवित्र करता है। आहार के विषय में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल क्या खाया जाए यह ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि कितना और कैसे खाया जाए यह भी उतना ही आवश्यक है। हिताहार मिताहार और अल्पाहार का सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि भोजन संतुलित और संयमित होना चाहिए। अधिक भोजन शरीर को रोगी बनाता है जबकि संतुलित भोजन शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखता है। जो व्यक्ति अपने आहार पर नियंत्रण रखता है वह स्वयं ही अपना वैद्य बन जाता है और उसे बार बार चिकित्सा की आवश्यकता नहीं पड़ती। आधुनिक जीवन शैली में आहार की शुद्धता धीरे धीरे समाप्त होती जा रही है। बाजार में मिलने वाली अनेक वस्तुएं देखने में तो आकर्षक होती हैं लेकिन उनमें ऐसे तत्व मिलाए जाते हैं जो शाकाहार की श्रेणी में नहीं आते। कई बार लोग अनजाने में ऐसी वस्तुओं का सेवन कर लेते हैं जो उनके सिद्धांतों के विपरीत होती हैं। इसलिए आज के समय में सजगता अत्यंत आवश्यक हो गई है। हर व्यक्ति को यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि वह जो खा रहा है वह वास्तव में शुद्ध है या नहीं। इसके साथ ही जल और वायु की शुद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शुद्ध हवा जीवन का आधार है और उसके बाद जल का स्थान आता है। भोजन तीसरे स्थान पर आता है। यदि वायु और जल शुद्ध नहीं होंगे तो उत्तम भोजन भी शरीर को पूर्ण लाभ नहीं दे पाएगा। इसलिए स्वस्थ जीवन के लिए इन तीनों का संतुलन आवश्यक है। आज विश्व में जो अशांति और असंतुलन देखने को मिल रहा है उसका एक कारण आहार में आया परिवर्तन भी है। तामसिक भोजन मन में उग्रता और असंयम को बढ़ाता है जबकि सात्विक भोजन शांति और संतुलन को प्रोत्साहित करता है। यदि समाज को शांत और संतुलित बनाना है तो आहार की शुद्धता पर ध्यान देना अनिवार्य है। वर्तमान समय में बच्चों और युवाओं में भी खानपान की आदतों में तेजी से बदलाव आ रहा है। आकर्षक विज्ञापन और आधुनिक जीवन शैली के प्रभाव में आकर वे ऐसी वस्तुओं का सेवन करने लगे हैं जो उनके स्वास्थ्य और संस्कार दोनों के लिए हानिकारक हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए परिवार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा। बच्चों को प्रारंभ से ही शुद्ध और संतुलित आहार के महत्व के बारे में जागरूक करना आवश्यक है। शाकाहार केवल एक खानपान की पद्धति नहीं है बल्कि यह एक जीवन दर्शन है। यह हमें दया करुणा और अहिंसा का संदेश देता है। जब हम शाकाहार अपनाते हैं तो हम केवल अपने शरीर की रक्षा नहीं करते बल्कि अन्य जीवों के प्रति भी संवेदना प्रकट करते हैं। यही संवेदना आगे चलकर समाज में प्रेम और सौहार्द का वातावरण बनाती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल विचारों तक सीमित न रहें बल्कि व्यवहार में भी परिवर्तन लाएं। शुद्ध आहार को अपनाकर हम अपने जीवन को स्वस्थ और संतुलित बना सकते हैं। इसके साथ ही समाज में भी जागरूकता फैलाकर एक सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यदि हम सभी मिलकर इस दिशा में प्रयास करें तो एक ऐसा समाज निर्मित हो सकता है जिसमें शांति संतुलन और करुणा का वास हो। अंततः यह कहा जा सकता है कि शुद्ध आहार ही स्वस्थ जीवन और धर्म साधना का आधार है। शरीर की रक्षा और उसकी पवित्रता बनाए रखने के लिए हमें अपने आहार पर विशेष ध्यान देना होगा। यही मार्ग हमें न केवल शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करेगा बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी ले जायगा। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 13 अप्रैल /2026