लेख
13-Apr-2026
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श्रीरामचन्द्रजी एवं सीताजी के विवाह का वर्णन माता सरस्वती एवं शेष भी करने में समर्थ नहीं हुए तब मेरे जैसे अल्पज्ञानी लेखक के लिए यह कार्य अत्यन्त दुष्कर है। किन्तु जब श्रीरामजी की कृपा हो जाती है तो वह कार्य उनकी कृपा से ही पूर्ण हो जाता है। श्रीरामजी के विवाह का वर्णन गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस में बड़े ही विस्तारपूर्वक किया है। उसे ज्यों का त्यों न लेकर प्रमुख भारतीय संस्कृति के विवाह रीति-रिवाजों को नई पीढ़ी को समझाने एवं जीवन में उतारने हेतु इस आलेख में प्रयास किया गया है। श्रीरामजी के समय जो विवाह के रीति-रिवाज, आज भी हमारी संस्कृति में बड़े ही श्रद्धा-भक्ति से संजोये रखा है। मंगलों का मूल लग्र का दिन आ गया। हेमन्त ऋतु और सुहावना अगहन का महीना था। ग्रह-तिथि नक्षत्र योग और वार श्रष्ठ थे। लग्र (मुहूर्त) शोध कर ब्रह्माजी ने उस पर विचार किया और उस लग्र पत्रिका को नारदजी के हाथ जनकजी के यहां भेज दिया। जनकजी के ज्योतिषियों ने भी वही गणना कर रखी थी। जब सब लोगों ने यह बात सुनी तब वे कहने लगे- यहाँ के ज्योतिषी भी ब्रह्माजी ही हैं। तब राजा जनक ने पुरोहित शतानन्दजी से कहा कि अब विलम्ब का क्या कारण है तब शतानन्दजी ने मंत्रियों को बुलवाया। वे सब मंगल का सामान सजाकर ले आए। सुन्दर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेद की ध्वनि कर रहे थे। सब लोग इस प्रकार आदरपूर्वक बारात को लेने चले और जहाँ बरातियों का जनवासा था वहाँ गए। दशरथजी का वैभव देखकर उनको देवराज इन्द्र भी बहुत ही तुच्छ लगने लगे। गुरु वसिष्ठिजी से पूछकर और कुल की सब रीति-रिवाजों को करके दशरथजी मुनियों और साधुओं के समाज को साथ लेकर चले। देवगण सुन्दर मंगल अवसर जानकर नगाड़े बजा-बजाकर फूल बरसाते हैं। शिवजी, ब्रह्माजी आदि देववृन्द यूथ (टोलियाँ) बना-बनाकर विमानों पर चढ़े। एहि बिधि सभु सुरन्ह समुझाया। पुनि आगे बर बसह चलाया। देवन्ह देखे दशरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता।। श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड ३१५-२ इस प्रकार शिवजी ने देवताओं को समझाया और फिर अपने श्रेष्ठ बैल (वृषभ) नन्दीश्वर को आगे बढ़ाया। देवताओं ने देखा कि दशरथजी मन में बड़े ही प्रसन्न और शरीर से पुलकित हुए चले जा रहे हैं। दशरथजी के चारों सुन्दर पुत्र ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो सम्पूर्ण मोक्ष (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य) शरीर धारण किए हुए हों। जिस घोड़े पर श्रीरामजी विराजमान हैं उसकी तेज चाल देखकर गरुड़ जी लजा जाते हैं। यह वर्णन नहीं किया जा सकता है। मानो कामदेव ने ही घोड़े का वेष धारण कर लिया है। जिस श्रेष्ठ घोड़े पर श्रीरामचन्द्रजी सवार हैं, उसका वर्णन सरस्वती भी नहीं कर सकती। शंकरजी श्रीरामचन्द्रजी के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पन्द्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे। भगवान विष्णु भी उन पर मोहित हो गए। ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए पर अपने आठ नेत्र जानकर पछताने लगे। इन्द्र अपने हजार नेत्रों से रामचन्द्रजी को देख रहे हैं और गौतमजी के शाप को अपने हितकर मान रहे हैं। इस प्रकार बारात को आती हुई जानकर बहुत प्रकार के वाद्य बजने लगे और रानी सुहागिनी स्त्रियों को लेकर परछन के लिए मंगल दृश्य सजाने लगी। श्रीराम का वरवेष देखकर सीताजी की माता सुनयनाजी के मन में जो सुख हुआ, उसे हजारों सरस्वती और शेषजी सौ कल्पों में भी वर्णन नहीं कर सकते हैं। मंगल अवसर जानकर नेत्रों के जल को रोके हुए रानी प्रसन्न मन से परछनÓ कर रही है। वेदों में कहे हुए कुलाचार के अनुसार सभी व्यवहार रानी ने भलीभाँति किए। दशरथजी अपनी मण्डली सहित विराजमान हुए। समय समय पर देवता फूल बरसाते हैं और भूदेव ब्राह्मण समयानुकूल शान्ति पाठ करते हैं। इस प्रकार श्रीराम मण्डप में आए और अर्घ्य देकर आसन पर बैठाए गए। वैदिक और लौकिक सब रीतियाँ करके जनकजी और दशरथजी बड़े प्रेमपूर्वक मिले। दोनों महाराज मिलते हुए बड़े ही शोभित हुए, कवि उनके लिए उपमा खोज-खोजकर लजा रहे थे। सुन्दर पावड़े और अर्घ्य देते हुए जनकजी दशरथजी को आदरपूर्वक मण्डप में ले आए। राजा जनकजी ने दान, मान, सम्मान, विनय और उत्तम वाणी से सारी बारात का सम्मान किया। प्रभु का शील स्वभाव देखकर देवगण मन में बहुत आनन्दित हुए। समय देखकर वसिष्ठजी ने शतानन्दजी को आदरपूर्वक बुलाया। वे सुनकर आदर के साथ आए। तब तक वसिष्ठजी ने कहा- अब जाकर राजकुमारी को शीघ्र ले आइए। मुनि की आज्ञा पाकर वे प्रसन्न हो गए। सीताजी मण्डप में आईं। उस अवसर की सब रीति, व्यवहार और कुलाचार दोनों कुलगुरुओं ने किए। कुलाचार करके गुरुजी प्रसन्न होकर गौरीजी, गणेशजी और ब्राह्मणों की पूजा करा रहे हैं। देवतागण प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते हैं, आशीर्वाद देते हैं और अत्यन्त सुख पा रहे हैं। मधुपर्कÓ आदि जिस किसी भी मांगलिक पदार्थ की मुनि जिस समय भी मन में चाह मात्र करते हैं। सेवकगण उसी समय सोने की परातों में कलशों में भरकर उन पदार्थों को लिए तैयार रहते हैं। हवन के समय अग्रिदेव शरीर धारण करके बड़े ही सुख से आहुति ग्रहण करते हैं। वेदों सारे वेद ब्राह्मण का वेष धारण करके विवाह की विधियाँ बता रहे हें। सुनयनाजी (सीताजी की माता) जनकजी के बायीं ओर ऐसी शोभित हो रही हैं मानों हिमाचल के साथ मैना भी शोभित हों। दूलह को देखकर राजा रानी प्रेम मग्र हो गए और उनके पवित्र चरणों को पखारने लगे। बर कुँअरी करतल जोहिर साखो चारू दोउ कुलगुर करैं। भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुजमुनि आनंद भरैं।। श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड ३२४ छन्द ३ दोनों कुल के गुरुवर और कन्या की हथेलियों को मिलाकर शाखोच्चार करने लगे। पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनन्द में भर गए। महाराज जनकजी ने लोक और वेद की रीति को करके कन्यादान दिया। प्रमुदित मुनिन्ह भाँवरी फेरीं। नेगसहित सब रीति निबेरीं।। राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहिन जाति बिधि केहीं।। श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड ३२५-४ मुनियों ने आनन्दपूर्वक भाँवरे फिरायीं और नेगसहित सब रीतियों को पूरा किया। श्रीरामचन्द्रजी सीताजी के सिर में सिंदूर दे रहे हैं, यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जाती। तब वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर जनकजी ने विवाह का सामान सजाकर माण्डवी, श्रुतकीर्ति और उर्मिला इन राजकुमारियों को बुला लिया। कुशध्वज की बड़ी कन्या माण्डवी को भरतजी को ब्याह दिया। जानकीजी की छोटी बहन उर्मिला को लक्ष्मण को ब्याह दिया और श्रुतकीर्ति को शत्रुघ्न को ब्याह दिया। श्रीराम विवाह मण्डप में जा रहे थे, उस समय देवतागण फूल बरसा रहे हैं, राजा जनवासे चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है। आकाश और नगर (मिथिला) दोनों में खूब कौतुहल हो रहा है, चारों ओर आनन्द छा रहा है। तब मुनीश्वर की आज्ञा पाकर सुन्दरी सखियाँ मंगलगान करती हुई दुलहिनों सहित दूल्हों को लिवाकर कोहबर अर्थात दूल्हा-दुल्हन के मिलन स्थान को चल पड़ी। सीताजी बार-बार श्रीरामजी को निहार रही हैं और सकुचा जाती है पर उनका मन नहीं सकुचाता है। श्रीरामचन्द्रजी का साँवला, शरीर स्वभाव से ही सुन्दर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवों को भी लजाने वाली है। महावर से युक्त चरणकमल बड़े सुहावने लगते हैं, जिन पर मुनियों के मनरूपी भौरें सदा छाये रहते हैं, पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रात: काल के सूर्य और बिजली की ज्योति को हरे लेती है। कमर में सुन्दर किंकणी और कटिसूत्र है। विशाल भुजाओं में सुन्दर-सुन्दर आभूषण सुशोभित है। पीत जनेउ महाछवि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई। सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषण राजे।। श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड ३२७-३ पीला जनेउ महान शोभा दे रहा है। हाथ की अँगूठी चित को चुरा लेती है। ब्याह के सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं। चौड़ी छाती पर हृदय पर पहनने के सुन्दर आभूषण सुशोभित है। पीला दुपट्टा काँखसोती (यज्ञोपवित-जनेऊ की तरह) शोभित है। जिसके दोनों छोरों पर मणि मोती लगे हैं। कमल के समान सुन्दर नेत्र हैं, कानों में सुन्दर कुण्डल हैं और मुख तो सारी सुन्दरता का खजाना है। सुन्दर भौहें और मनोहर नासिका है। ललाट पर तिलक तो सुन्दरता का घर ही है जिसमें मंगलमय मोती और मणि गुँथे हुए हैं। ऐसा मनोहर सोह रहा है। सुन्दर मौर में बहुमूल्य मणियाँ गुथी हुई हैं, सभी अंग चित्र को चुरा लेते हैं। सब नगर की स्त्रियाँ और देव सुन्दरियाँ दुलह को देखकर तिनका तोड़ रही है, (उनकी बलैया ले रही है) और मणि, वस्त्र तथा आभूषण न्यौछावर करके आरती उतार रही हैं तथा मंगलगान कर रही हैं। देवतागण फूलों की वर्षा कर रहे हैं और सूतमागध तथा भाट सुयश सुना रहे हैं। छन्द- कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै। अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै।। लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं। रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब हैं।। (श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड ३२७/छन्द) सुहागिनी स्त्रियाँ सुख पाकर कुँवर और कुमारियों को कोहबर (कुल देवता के स्थान) में लाई और अत्यन्त प्रेम से मंगल गीत गा-गाकर लौकिक रीति करने लगीं। पार्वतीजी श्रीरामचन्द्रजी को लहकौर (वर-वधू को परस्पर ग्रास देना) सिखाती है और सरस्वतीजी सीताजी को सिखाती हैं। रनिवास हास विलास के आनन्द में मग्र है। (श्रीरामजी और सीताजी को देख-देखकर) सभी अपने जन्म का परमफल प्राप्त कर रही है। तदनन्तर वर कन्याओं को सब सुन्दर सखियों जनवासे को लिवा चलीं। योगिराज, सिद्ध मुनीश्वर और देवताओं ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को देखकर दुन्दभी बजाई और हर्षित होकर फूलों की वर्षा करते हुए जय हो, जय हो, जय हो कहते हुए वे अपने लोक को प्रस्थान कर गए। तब सब (चारों) कुमार बहुओं सहित पिताजी के पास आए। फिर बहुत प्रकार की रसोई बनी। जनकजी ने बरातियों को बुला भेजा। राजा दशरथजी ने पुत्रों सहित गमन किया। आदर के साथ सबके चरण धोये और सबको यथायोग्य पीढ़ों पर बैठाया। तब जनकजी ने अवधपति दशरथजी के चरण धोये। उनके शील और स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता। बहुरि रामपद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए। तीनिउ भाई रामसम जानी। धोए चरन जनक निज पानी।। (श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड/३२८/३) फिर रामचन्द्रजी के चरणकमलों को धोया जो शिवजी के हृदय-कमल में छिपे रहते हैं। तीनों भाइयों को श्रीरामचन्द्रजी के ही समान जानकर जनकजी ने उनके भी चरण अपने हाथों से धोये। राजा जनकजी ने सभी को उचित आसन दिए और सब परसने वालों को बुला लिया। आदर के पत्तलें पड़ने लगीं, जो मणियों के पत्तों से सोने की कील लगाकर बनाई गई थीं। स्वादिष्ट और पवित्र दाल, भात और गाय के सुगन्धित घी क्षणभर में सबके सामने परोसा गया। सभी लोग पंचकौर करके भोजन करने लगे। गाली (महिला के व्यंग गीत) गाना सुनकर वे अत्यन्त प्रेममग्र हो गए। अमृत के समान अनेक स्वादिष्ट पकवान परोसे गए जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता। भोजन करते समय पुरुष और स्त्रियों के नाम ले लेकर स्त्रियाँ मधुर ध्वनि से गाली दे रही थी। गाली (एक प्रकार का व्यंग्य गीत) गा रही थी। भोजन के पश्चात् पान देकर जनकजी ने समाज सहित दशरथजी का पूजन किया। दशरथजी प्रसन्न होकर जनवासे को चले गए। याचकों के समूहों को बुलवा दिया और सब को उनकी रुचि पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़े, हाथी और रथ भी श्री दशरथजी ने दिए। इस प्रकार श्री रामचन्द्रजी के विवाह का उत्सव हुआ। जिन्हें सहस्त्रमुख हैं वे शेष जी भी उसका वर्णन नहीं कर सकते। बारात जा रही यह सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो गईं मानों थोड़े जल में मछलियाँ छटपटा रही हों। वे सब आशीर्वाद देकर सिखावन देती हैं- तुम सदा अपने पति की प्यारी होओ। तुम्हारा सुहाग अचल हो। हमारी यही आशीष है- सासु ससुर गुर सेवा करेहूँ। पति रुखलखी आयसु अनुसरेहूँ। अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी। (श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड ३२४/३) सास, ससुर और गुरु की सेवा करना। पति का रुख देखकर उनकी आज्ञा पालन करना। सयानी सखियाँ अत्यन्त स्नेह के वश कोमलवाणी से स्त्रियों के धर्म सिखलाती हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने हाथ जोड़ कर बिदा मांगते हुए रानी को बार-बार प्रणाम किया आशीर्वाद पाकर और फिर सिर नवाकर भाइयों सहित श्री रघुनाथजी बिदा हो गए। ईएमएस / 13 अप्रैल 26