कोलकाता(ईएमएस)। पश्चिम बंगाल की राजनीति और विधानसभा चुनावों का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों के लिए ममता बनर्जी की सत्ता में निरंतरता एक शोध का विषय रही है। देश की सबसे शक्तिशाली पार्टी भाजपा की तमाम कोशिशों के बावजूद, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का दुर्ग अभेद्य बना हुआ है। इस राजनीतिक मजबूती के पीछे की सबसे बड़ी ताकत ममता बनर्जी की महिला ब्रिगेड है, जो न केवल पार्टी के शीर्ष पदों पर आसीन है, बल्कि जमीनी स्तर पर संगठन की रीढ़ बनकर उभरी है। 71 वर्षीया ममता बनर्जी, जिन्हें उनके समर्थक दीदी कहकर पुकारते हैं, ने अपनी सादगीपूर्ण छवि और संघर्षशील व्यक्तित्व के साथ महिलाओं को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा है। कन्याश्री, लक्ष्मी भंडार और स्वास्थ्य साथी जैसी कल्याणकारी योजनाओं ने राज्य में एक वफादार महिला वोट बैंक तैयार किया है। लेकिन ममता की शक्ति केवल वोट बैंक तक सीमित नहीं है; उन्होंने महिलाओं का एक ऐसा नेतृत्व ढांचा तैयार किया है जो संगठन और सरकार दोनों को मजबूती प्रदान करता है। तृणमूल कांग्रेस चुनावों में लगभग 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देती है, जो अन्य राष्ट्रीय दलों की तुलना में कहीं अधिक है। इस महिला ब्रिगेड में सबसे अनुभवी चेहरों में 70 वर्षीया चंडीमा भट्टाचार्य शामिल हैं। राज्य के वित्त और भूमि जैसे महत्वपूर्ण विभागों की मंत्री चंडीमा, सिंगुर-नंदीग्राम आंदोलन के समय से ममता की भरोसेमंद सहयोगी रही हैं। पेशे से वकील चंडीमा पर नेतृत्व का अटूट विश्वास ही है कि 2016 में चुनाव हारने के बावजूद उन्हें उपचुनाव के जरिए वापस लाया गया और मंत्री पद सौंपा गया। वहीं, 63 वर्षीया डॉ. शशि पांजा, जो महिला एवं बाल विकास मंत्रालय संभाल रही हैं, ने कन्याश्री जैसी योजनाओं को जमीनी स्तर पर सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई है। संसदीय राजनीति में बारासात से सांसद डॉ. काकोली घोष दस्तीदार और राज्यसभा में पार्टी की मुखर आवाज डोला सेन जैसे नाम ममता बनर्जी के पुराने और संघर्ष के दिनों के साथी हैं। युवा नेतृत्व में संथाली फिल्मों से राजनीति में आईं बिरबाहा हांसदा जनजातीय क्षेत्रों में पार्टी का प्रमुख चेहरा हैं। इसके अलावा, कृष्णा चक्रवर्ती जैसी नेता पिछले चार दशकों से ममता बनर्जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। अब जब ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में लौटने की तैयारी कर रही हैं, तो उनकी यह सशक्त महिला ब्रिगेड कोलकाता की सड़कों से लेकर दिल्ली के गलियारों तक चुनावी बिसात बिछाने में जुट गई है। यह नेतृत्व ही टीएमसी को बंगाल की राजनीति में अन्य दलों से अलग और मजबूत बनाता है। वीरेंद्र/ईएमएस 13 अप्रैल 2026