लेख
14-Apr-2026
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वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के बदलते परिदृश्य में अमेरिका की पारंपरिक ताकत को कई मोर्चों पर चुनौती मिलना शुरू हो गई है। ब्रिक्स देशों के विस्तार और अमेरिका के प्रति नाराजी के बाद अब अफ्रीकन यूनियन भी वैश्विक शक्ति संतुलन में अमेरिका के खिलाफ अपनी भूमिका को मजबूती से स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सबसे बड़ा परिवर्तन आर्थिक मोर्चे पर देखने को मिल रहा है। लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व बना हुआ था। पहले “पेट्रो-डॉलर” की व्यवस्था कहा जाता है। डॉलर के जरिए पेट्रोलियम का कारोबार जब से शुरू हुआ है तब से डॉलर और अमेरिका दोनों का प्रभुत्व बढ़ता चला गया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद जिस तरह से टैरिफ को लेकर सारी दुनिया के देशों को धमकाया। वैश्विक व्यापार संधि को ठुकराते हुए उन्होंने अपने नियम कानून बनाने शुरू कर दिए। इससे अमेरिका की साख सारी दुनिया में घट गई। अमेरिका ने जिस तरह से वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को आधी रात को राष्ट्रपति भवन से उठा लिया था, इस कार्रवाई को दुनिया के किसी भी देश ने पसंद नहीं किया। अब इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान के ऊपर हमला किया है, यह हमला उस समय हुआ था जब बातचीत चल रही थी। इस हमले के जरिए ईरान के धर्मगुरु सहित 180 छोटी-छोटी बच्चियों और हजारों लोगों की हत्या इजराइल और अमेरिका ने की है। उसके बाद से अमेरिका की मुश्किलें एक के बाद एक बढ़ती चली जा रही हैं। ईरान, रूस और चाइना जैसे देश अपने द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का उपयोग लगातार बढ़ा रहे हैं। कई देशों ने अमेरिकी ट्रेजरी से बांड और गोल्ड का स्टॉक निकाल लिया है। सारी दुनिया के देशों की डॉलर पर निर्भरता कम हो रही है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति भी दिन-प्रतिदिन खराब होती चली जा रही है। अमेरिका की आर्थिक और सामरिक ताकत ही सबसे बड़ी ताकत थी, जिसके बल पर वह सारी दुनिया में राज कर रहा था। यहां अफ्रीकी यूनियन का रुख भी महत्वपूर्ण हो चला है। अफ्रीका के कई देश मिलकर अपने संसाधनों विशेषकर खनिज और ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय व्यापार व्यवस्था की ओर आगे बढ़ रहे हैं। इससे अमेरिका और पश्चिमी देशों की पारंपरिक पकड़ और आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है। ऐसे में यदि अफ्रीकी देश एकजुट होकर व्यापार और मुद्रा के नए विकल्प तलाश कर लेते हैं, तो बड़ी तेजी के साथ वैश्विक आर्थिक समीकरण बदलना तय है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव विशेषकर इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष ने अमेरिका की ताकत को चुनौती देने का काम कई देश मिलकर कर रहे हैं। मुस्लिम देशों में भी अमेरिका की नीतियों को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। जिसका असर अमेरिका की आर्थिक स्थिति में पड़ना तय है। यह कहना जल्दबाजी होगी, अमेरिका की शक्ति क्षीण हो रही है। सैन्य, तकनीकी और वित्तीय क्षेत्रों में अमेरिका की बढ़त अभी भी कायम है। इतना स्पष्ट है, विश्व अब एकध्रुवीय व्यवस्था पर नहीं चल सकता है। नई शक्तियां तेजी के साथ उभर रही हैं। वैश्विक व्यवस्था बहुध्रुवीय दिशा में आगे बढ़ रही है। इस समय अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती नीतियों में लचीलापन लाकर नए शक्ति केंद्रों के साथ संतुलित संबंध स्थापित करना होगा। पिछले 60 वर्षों से अमेरिका की जो दादागिरी थी अब वह देखने को नहीं मिलेगी। आने वाले वर्षों में यह देखना होगा, अमेरिका इस चुनौती का किस तरह से सामना करता है। डोनाल्ड ट्रम्प की आक्रामक टैरिफ और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर धमकी भरी नीतियॉं अमेरिका के लिए घातक हो सकती हैं। अल्प काल में दबाव बना सकती हैं, दीर्घ काल में सहयोगी देशों का विश्वास और भी कम कर सकती हैं। इससे वैश्विक व्यापार संतुलन बिगड़ेगा। अमेरिका की आर्थिक और कूटनीतिक स्थिति तेजी के साथ कमजोर हो सकती है। ट्रंप की नीतियों के कारण जो हाल सोवियत रूस का हुआ था, उसी तरह के आसार अब अमेरिका के दिखने लगे हैं। सनत कुमार जैन/14 अप्रैल2026