लेख
14-Apr-2026
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(15 अप्रैल विश्व कला दिवस) कहते हैं कि कोरे कागज पर जब पहली बार कोई टेढ़ी-मेढ़ी लकीर खींची जाती है, तो वह महज एक आकृति नहीं होती, बल्कि इंसान के भीतर पल रहे एक विचार का पहला भौतिक जन्म होता है। वह पहली लकीर गवाह होती है उस छटपटाहट की, जो कुछ नया रचने के लिए हमारे भीतर हमेशा मचलती रहती है। आज का समय केवल सूचनाओं का नहीं, बल्कि उन सूचनाओं को खूबसूरती से पेश करने और उनसे नए रास्ते तलाशने का है। कला और नवाचार, ये दो ऐसे शब्द हैं जो सुनने में तो अलग-अलग क्षेत्रों के लगते हैं, लेकिन असल में ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कला जहाँ हमें संवेदनाओं से भरती है, वहीं नवाचार उन संवेदनाओं को समाधान में बदल देता है। भारतीय परिदृश्य में देखें तो कला कभी भी केवल दिखाने या सजाने की वस्तु नहीं रही, बल्कि यह हमारे जीवन जीने का एक अभिन्न ढंग रही है। हमारे देश के गाँवों की कच्ची दीवारों पर जब कोई महिला बिना किसी औपचारिक डिग्री के अपनी उंगलियों से मधुबनी या वरली के जरिए सदियों का इतिहास उकेर देती है, तो वह उसकी रचनात्मकता का शिखर होता है। दक्षिण के मंदिरों की वह बारीक नक्काशी हो या बनारस के घाटों पर सुबह की पहली किरण के साथ गूँजती शास्त्रीय बंदिशें, हमारी हर परंपरा में एक इनोवेशन छिपा रहा है। हमने मिट्टी से घड़ा बनाया तो वह हमारी जरूरत थी, लेकिन उसी घड़े को जब एक खास शक्ल दी गई ताकि पानी शीतल रहे और देखने वाले की आँखों को भी सुकून मिले, तो वह कला और विज्ञान का अद्भुत संगम बन गया। दुनिया भर में हर साल 15 अप्रैल को विश्व कला दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो महान खोजी और कलाकार लियोनार्डो दा विंची की याद दिलाता है। दा विंची एक ऐसे शख्सियत थे जिन्होंने सदियों पहले यह साबित कर दिया था कि एक कलाकार के भीतर ही एक वैज्ञानिक और एक इंजीनियर छिपा होता है। भारत में भी आज इसी सोच को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। आज जब पूरी दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी मशीनी दिमाग के बढ़ते प्रभाव से सहमी हुई है, तब मानवीय संवेदनाओं वाली कला की अहमियत और बढ़ गई है। मशीनें करोड़ों आंकड़े जुटा सकती हैं, वे गणना कर सकती हैं, लेकिन वे उस एहसास को जन्म नहीं दे सकतीं जो एक कलाकार की मौलिक सोच से उपजता है। मशीन कभी भी उस दर्द, उस संघर्ष या उस निस्वार्थ मुस्कान को कैनवास पर वैसे नहीं उतार सकती, जैसा एक इंसान अपनी जिंदगी के अनुभवों से निचोड़कर लाता है। बदलते भारत में अब कला और तकनीक का एक नया और गहरा रिश्ता बनता दिख रहा है। यह बदलाव की एक नई भाषा है। आज का युवा अपनी पारंपरिक विरासत को छोड़ नहीं रहा, बल्कि उसे तकनीक के पंख लगा रहा है। जब एक बुनकर सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लेकर अपनी साड़ियों के डिजाइन सीधे वैश्विक बाजार तक पहुँचाता है, तो वह अपनी विरासत को नया जीवन दे रहा होता है। यह नवाचार ही है जो हमारी मरती हुई कलाओं को ऑक्सीजन दे रहा है। हमें यह समझना होगा कि नयापन या इनोवेशन कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बल्कि यह अपने पुराने काम को थोड़े अलग और बेहतर तरीके से करने का साहस है। शिक्षा के क्षेत्र में भी हमें इसी नजरिए की दरकार है। अक्सर हम बच्चों को तयशुदा ढर्रे पर चलाने की होड़ में उनके भीतर के सृजनात्मक पक्ष को नजरअंदाज कर देते हैं। हम उन्हें डॉक्टर या इंजीनियर तो बनाना चाहते हैं, लेकिन एक रचनात्मक इंसान बनाना भूल जाते हैं। हमें ऐसे समाज और ऐसी शिक्षा पद्धति की जरूरत है जहाँ लीक से हटकर सोचने को न केवल स्वीकार किया जाए, बल्कि उसे प्रोत्साहित भी किया जाए। यदि कोई बच्चा गणित के उलझे हुए सवालों को किसी धुन या चित्र के जरिए हल करता है, तो वह भविष्य के एक बड़े नवाचारी बनने की राह पर है। अंततः, हमें कला को केवल दीर्घाओं या ड्राइंग रूम की सजावट तक सीमित नहीं रखना चाहिए। चाहे आप एक शिक्षक हों, खेत में पसीना बहाता किसान हों, घर संभालती गृहणी हों या कंप्यूटर पर कोडिंग करता सॉफ्टवेयर इंजीनियर-अपने काम को करने का आपका जो अपना मौलिक और बेहतर तरीका है, वही आपकी असली कला है। भारत की असली ताकत यहाँ के लोगों के हुनर और उनकी सांस्कृतिक विविधता में है। जब हम अपनी इस कलात्मक सोच को आधुनिक तकनीक और नए विचारों से पूरी तरह जोड़ देंगे, तभी एक ऐसे समाज का निर्माण होगा जहाँ हर हाथ में कौशल होगा और हर दिमाग में एक नया विचार। आइए, इस रचनात्मकता के सप्ताह को अपनी जिंदगी के कोरे कैनवास पर नए रंग भरने और समाज में एक सार्थक बदलाव लाने की शुरुआत बनाएं। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 14 अप्रैल 26