लेख
14-Apr-2026
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हर बालक अनगढ़ पत्थर की तरह है जिसमें सुन्दर मूर्ति छिपी है, जिसे शिल्पी की आँख देख पाती है। वह उसे तराश कर सुन्दर मूर्ति में बदल सकता है। क्योंकि मूर्ति पहले से ही पत्थर में मौजूद होती है शिल्पी तो बस उस फालतू पत्थर को जिसमें मूर्ति ढकी होती है, एक तरफ कर देता है और सुन्दर मूर्ति प्रकट हो जाती है। माता-पिता शिक्षक और समाज बालक को इसी प्रकार सँवार कर खूबसूरत व्यक्तित्व प्रदान करते हैं। मां- बाप प्रतिफल बच्चों को सुख देने के लिए बेचैन रहते हैं इनके जीवन का 90 प्रतिशत संघर्ष तो मां –बाप ही पूरा कर देते हैं ऐसे लोग होते है जो पढ़ाई का खर्च खुद उठाते हैं आज के बच्चे इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते इन्हें लगता है कि फीस मां- बाप को ही भरनी है पेरेंट्स बच्चों को अच्छे से पढ़ा देते हैं अच्छी सी नौकरी लगवा देते हैं बच्चों के जीवन में संघर्ष बचा ही नहीं कुछ संघर्ष संतानों के लिए भी छोड़ना चाहिए एहसास कराना चाहिए कि जो सुविधाएं इन्हें मिल रहे हैं ये इनका अधिकार नहीं बल्कि माता- पिता का उपकार है परिंदा भी अपने छोटे बच्चों को पेड़ से धक्का दे देता है इसके बाद वो बच्चा पेड़ से गिरता नहीं उड़ जाता है और तब उस बच्चे को पता चलता है कि अगर धक्का नहीं दिया होतो तो में आसमान में नहीं आया होता इसे प्रकार जिंदगी के दरिया में इन बच्चों को हाथ पैर चलाने देना होगा जब संघर्ष आता है तो लोग दुर्भाग्य मानने लगते हैं संघर्ष और दुर्भाग्य में फर्क है दुर्भाग्य परेशान करता है संघर्ष तराशता है पांच चीजें बच्चों को अवश्य सिखाएं परिश्रम ईमानदारी सहनशीलता सहयोग की वृत्ति और परिणाम के प्रति बेफिक्र होना इससे बच्चे परिपक्व होगें हम बहुत-सी चीजें करने के इच्छुक हैं—अच्छी आदतें डालने और बुरी आदतें छोड़ने, एकाग्रता के साथ पढ़ने और मन लगाकर कुछ करने का हम संकल्प लेते हैं। परन्तु बहुधा हमारा मन विद्रोह कर बैठता है और हमें इन संकल्पों को रूपायित करने के हमारे प्रयास से पीछे हटने को मजबूर कर देता है। हमारे सामने किताब खुली पड़ी है और हमारी आँखें खुली हैं; परन्तु मन कुछ पुरानी बातों को सोचता हुआ या भविष्य के लिए ख्याली पुलाव पकाता हुआ इधर-उधर घूमने लगता है। जब हम थोड़ी देर के लिए प्रार्थना, जप या ध्यान करने बैठते हैं, तब भी ऐसा ही होता है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं, ‘‘स्वतन्त्र ! हम एक क्षण तो स्वयं अपने मन पर शासन नहीं कर सकते ! यही नहीं, किसी विषय पर उसे स्थिर नहीं कर सकते और अन्य, सबसे हटाकर किसी एक बिन्दु पर उसे केन्द्रित नहीं कर सकते ! फिर भी हम अपने को स्वतन्त्र कहते हैं ! जरा इस पर गौर तो करो !’’शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थी का व्यक्तित्व विकास उनकी योजना का अनिवार्य अंग नहीं बन पाता है।चाहे आई.टी. का क्षेत्र हो अथवा मैनेजमेंट या मेडिकल का, सभी में सन्तोषजनक प्रगति हुई है, परन्तु युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण की समस्या जस की तस दिखाई दे रही है। भगवद्गीता का कहना है कि असंयमित मन एक शत्रु के समान और संयमित मन हमारे मित्र के समान आचरण करता है। शिक्षा शास्त्रियों के अनुसार शिक्षा को त्रिमुखी प्रक्रिया माना गया है। शिक्षक, शिक्षार्थी एवं पाठ्यक्रम तीन आधार इस प्रक्रिया में हैं। शिक्षक का पुनीत कार्य शिक्षार्थी को पढ़ाना है, पाठ्यक्रम इसका माध्यम है। स्पष्ट है कि शिक्षक के लिए साध्य शिक्षार्थी है न कि पाठ्यक्रम। पाठ्यक्रम तो शिक्षक के लिए साधन के रूप में उपयोग में लाया जाता है। समय परिवर्तन के साथ साधन, साध्य के रूप में परिवर्तित हो गया है। शिक्षक का केन्द्रीकरण पाठ्यक्रम तक सीमित रह गया है, शिक्षार्थी द्वितीय वरीयता क्रम में आ गया है। अस्तु! शिक्षा का सर्वांगीण विकास अथवा शिक्षार्थी के व्यक्तित्व विकास की अवधारणा उलट गयी है। लक्ष्य परिवर्तित हो गये हैं, व्यक्तित्व के विकास का स्थान अंक-अर्जन ने प्राप्त कर लिया है, लक्ष्य उपाधि अथवा परिणाम हासिल करने तक सिमट गया है। समस्त शिक्षा-तन्त्र का भी एकमात्र उद्देश्य विद्यालय के उत्तम परीक्षाफल तक ही सीमित हो गया है। विद्यार्थी के विकास से उनका अब कोई लेना-देना नहीं है। पाठ्यक्रम केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था ने जो भी विकास किया है वह मात्र पाठ्यक्रम का। दिनोंदिन बस्ते का वजन बढ़ रहा है, विद्यार्थी के विकास की गति उसी के सापेक्ष घट रही है। विद्या प्रदाता को गुरु कहा जाता था, विद्या ग्रहण करने वाले को शिष्य। शनै:-शनै: गुरु-अध्यापक में परिवर्तित हुआ और शिष्य-विद्यार्थी में। वर्तमान में अध्यापक भी शिक्षक के रूप में तथा विद्यार्थी भी शिक्षार्थी के रूप में विद्यमान हैं। व्यक्तित्व निर्माण अथवा सद्गुण तथा सद्संस्कार का सम्बन्ध गुरु और शिष्य से है, शिक्षक और शिक्षार्थी से नहीं। संस्कार तथा जीवन निर्माण की बात तभी पूर्ण हो सकती है जब शिक्षक-गुरु के रूप में कार्य करें तथा शिक्षार्थी स्वयं को शिष्य के स्वरूप को परिलक्षित करें। दोनों में पारस्परिक यथायोग्य परम्पराओं एवं सम्बंधों का निर्वहन हो। शिक्षक और शिक्षार्थी के मध्य निरन्तर सम्पर्क, सम्बन्ध तथा संस्कारोचित व्यवहार हो। व्यक्तित्व-विकास में वंशानुक्रम तथा परिवेश दो प्रधान तत्त्व हैं। वंशानुक्रम व्यक्ति को जन्मजात शक्तियाँ प्रदान करता है। परिवेश उसे इन शक्तियों को सिद्धि के लिए सुविधाएँ प्रदान करता है। बालक के व्यक्तित्व पर सामाजिक परिवेश प्रबल प्रभाव डालता है। ज्यों-ज्यों बालक विकसित होता जाता है, वह उस समाज या समुदाय की शैली को आत्मसात् कर लेता है, जिसमें वह बड़ा होता है, विकास का तात्पर्य यहां सद्गुणों से है, नैतिक एवं जीवन मूल्यों से है, कुल मिलाकर संस्कारों से है। जिसमें माता पिता का वचन पालन करना आवश्यक है जो भगवान राम ने मर्यादा का पालन किया,वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने शिक्षा को केवल साक्षर बनाने तक परिसीमित कर दिया है, शिक्षा का परम उद्देश्य संस्कार होता है, वह ओझल हो गया है।विद्या ददाति विनयम् के आधार पर प्रदान की जाने वाली शिक्षा विकासोन्मुखी एवं संस्कारोन्मुखी थी। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक-शिक्षार्थी सम्बन्ध लगभग समाप्त हो गये हैं। समस्त शिक्षण व्यवस्था का केन्द्र-बिन्दु शिक्षक है। सामाजिक मूल्यों में चाहे जितनी गिरावट आयी हो किन्तु समूचा समाज शिक्षक को आज भी अपेक्षाकृत अन्य वर्गों की तुलना में सम्मान की दृष्टि से देखता है।॰ उन्ही लोगों के साथ न जुड़े रहना जो आपको बार बार और लगातार दर्द दे रहें हैं। यह सोचकर बैठ जाना की आप जीवन कुछ खो नहीं सकते। जब अचानक संघर्ष आता है तो तैयारी न होने पर लोग टूट जाते हैं या बिखर जाते हैं टूट गए तो फिर जुड़ जाएंगे लेकिन बिखर गए तो व्यक्तित्व के टुकड़े समेटना मुश्किल होगा आज के बच्चों को तो मालूम ही नहीं है कि संघर्ष होता क्या है।अतः हमें अपने मन की प्रक्रिया के विषय में एक स्पष्ट धारणा रखने की आवश्यकता है। क्या हम इसे अपने आज्ञा-पालन में, अपने साथ सहयोग करने में प्रशिक्षित कर सकते हैं ? किस प्रकार हमारे व्यक्तित्व के विकास में माता पिता का अहम योगदान रहता है। ईएमएस / 14 अप्रैल 26