राष्ट्रीय
15-Apr-2026
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-1940 में जर्मन ने फ्रांस पर कब्जा किया तो वहां की संस्कृति-खानपान बदल गया नई दिल्ली,(ईएमएस)। चेलो कबाब, कबाब कूबीदेह, आश रेश्तेह, मोरसा पोलो...ये ईरान के पारंपरिक व्यंजन हैं। जब दो देश युद्ध के मैदान में आमने-सामने होते हैं, तो सिर्फ सरहदें नहीं बदलतीं, बल्कि आम आदमी की थाली का स्वाद तक बदल सकता है। आज ईरान इजराइल-अमेरिका के बीच तनाव को देखकर यह सवाल उठा रहा है कि क्या लंबी खींचने वाली जंग किसी देश के खानपान की पहचान मिटा सकती है? युद्ध का प्रभाव इतना गहरा होता है कि यह सदियों पुरानी परंपराओं को उखाड़ फेंकता है। जब रसद की कमी होती है, तो इंसान खाने-पीने को मजबूर हो जाता है जिसे उसने कभी जानवरों के लिए छोड़ दिया था। इतिहास गवाह है कि जंग के बाद कई देशों ने अपने पसंदीदा पकवानों को भूलकर उन चीजों को अपना लिया जो केवल जिंदा रहने के लिए जरूरी थीं। फ्रांस इसका उदाहरण है- कैसे एक भीषण युद्ध ने दुनिया के सबसे बेहतरीन खानपान वाले देश की आदतों को हमेशा के लिए बदल दिया। जानकारी के मुताबिक दूसरे विश्वयुद्ध में जून 1940 में जब जर्मन सेना ने फ्रांस पर कब्जा किया, तो वहां की खानपान संस्कृति पूरी तरह बदल गई। पनीर, मांस और बेहतरीन ब्रेड के लिए मशहूर फ्रांस में अचानक इन चीजों की किल्लत हो गई। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 1942 आते-आते हालात इतने बदतर हो गए कि एक औसत फ्रांसीसी को दिन भर में केवल 1,110 कैलोरी ही मिल पा रही थी। यह वह दौर था जब खाने की कमी ने लोगों को अपनी पसंदीदा चीजें छोड़ने पर मजबूर कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक जंग ने फ्रांस में कई नई चीजों को जन्म दिया। वहां लोग इसे इरशात्ज़ या विकल्प कहने लगे- जैसे शक्कर की जगह सैकरिन ने ले ली, मक्खन की जगह चर्बी का इस्तेमाल होने लगा और असली कॉफी तो एक सपना ही बन गई थी। कॉफी की कमी को पूरा करने के लिए लोगों ने चने, जौ और चिकोरी की जड़ों को भूनकर पीना शुरू किया। आज भी फ्रांस के सुपरमार्केट में मिलने वाली चिकोरी कॉफी इसी युद्ध की ही देन है। जानकार बताते हैं कि रूटाबागा जो एक तरह का शलजम और यरूसलम आर्टिचोक जैसी सब्जियां युद्ध से पहले केवल जानवरों को खिलाई जाती थीं, लेकिन जब आलू की कमी हुई तो फ्रांसीसियों को इन्हीं जानवरों के चारे पर निर्भर रहना पड़ा। युद्ध के बाद कई दशकों तक लोगों ने इन सब्जियों को छूना तक पसंद नहीं किया क्योंकि ये उन्हें गरीबी और बदहाली की याद दिलाती थीं। फ्रांस की मशहूर सफेद ब्रेड भी युद्ध की भेंट चढ़ गई। 1940 के दशक में सफेद मैदा मिलना बंद हो गया और उसकी जगह काले अनाज, चेस्टनट और आलू के मिश्रण वाली रोटियां बनने लगीं। लोग अपने दोस्तों के घर जाते समय अपनी हिस्से की रोटी साथ ले जाते थे। युद्ध खत्म होने के बाद सफेद ब्रेड की चाहत इतनी बढ़ गई कि पारंपरिक खमीर वाली ब्रेड बनाने वालों को बुरी नजर से देखा जाने लगा, क्योंकि लोग अब सिर्फ सफेद और आधुनिक ब्रेड खाना चाहते थे। सिराज/ईएमएस 15 अप्रैल 2026