राष्ट्रीय
16-Apr-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। आयुर्वेदाचार्य के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक अनूठी शारीरिक प्रवृत्ति (प्रकृति) होती है। मनुष्य का शरीर त्रिदोष सिद्धांत (वात, पित्त और कफ) पर आधारित होता है। यदि व्यक्ति अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप जीवनशैली और आहार का चुनाव करे, तो आधी से अधिक बीमारियों को स्वाभाविक रूप से रोका जा सकता है। हालांकि, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में शरीर की प्रकृति के अनुसार आहार का चुनाव करना एक चुनौती बन गया है। यही कारण है कि गलत खान-पान की वजह से शरीर में रूखापन, मंद पाचन अग्नि (कमजोर मेटाबॉलिज्म), मधुमेह और थायराइड जैसी समस्याएं अब हर घर की कहानी बन चुकी हैं, विशेषकर उन व्यक्तियों के लिए जिनकी प्रकृति वात प्रधान है। ऐसे में, यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि वात प्रवृत्ति वाले लोगों को चावल का सेवन करना चाहिए या नहीं और यदि हाँ, तो किस प्रकार। आयुर्वेद के गहन ज्ञान के अनुसार, वात दोष का स्वभाव हल्का, ठंडा और रूखापन उत्पन्न करने वाला होता है। दूसरी ओर, चावल का स्वभाव स्वाद में मीठा, प्रकृति में ठंडा और पाचन में अपेक्षाकृत आसान माना जाता है। इस विरोधाभास के बावजूद, आयुर्वेद यह स्पष्ट करता है कि यदि कुछ विशिष्ट नियमों और सावधानियों के साथ चावल का सेवन किया जाए, तो यह वास्तव में वात दोष को शांत करने और शरीर को संतुलित रखने में मदद कर सकता है। अब सवाल यह उठता है कि वात प्रकृति वाले लोगों को चावल का सेवन किस प्रकार करना चाहिए ताकि इसके अधिकतम लाभ मिल सकें और कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। वात प्रकृति वालों को कम से कम 1 साल पुराने चावल का सेवन करना चाहिए। आयुर्वेद मानता है कि चावल जितना पुराना होता है, उतना ही उसके गुण बढ़ते हैं और यह पचने में हल्का हो जाता है, जिससे वात को शांत करने में मदद मिलती है। हमेशा गर्म और ताजा बने हुए चावल का ही सेवन करें। फ्रिज में रखा ठंडा या बासी चावल वात दोष को बढ़ा सकता है और पाचन संबंधी समस्याएं उत्पन्न कर सकता है, जैसे गैस और पेट फूलना। चावल का सेवन हमेशा शुद्ध घी के साथ करें। घी अपने चिकनाई (स्निग्ध) गुणों के कारण वात के रूखेपन को संतुलित करता है, शरीर के आंतरिक अंगों को पोषण देता है और पाचन को सुगम बनाता है। चावल का सेवन हमेशा दोपहर के समय लंच में ही करें। इस समय हमारी पाचन अग्नि (जठराग्नि) सबसे तीव्र होती है और यह किसी भी प्रकार के भोजन को पचाने में सर्वाधिक समर्थ होती है, जिससे वात असंतुलन की संभावना कम हो जाती है। वात प्रकृति वाले लोगों को चावल के साथ दही का सेवन करने से बचना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार, दही और चावल का यह संयोजन शरीर में वात का असंतुलन पैदा कर सकता है और कफ भी बढ़ा सकता है। कोशिश करें कि चावल को हल्की और सुपाच्य मूंग दाल तथा एक चम्मच घी के साथ खाएं। मूंग दाल और घी का संयोजन चावल के शुष्कपन को कम करता है और इसे वात के लिए अधिक अनुकूल बनाता है। वात प्रकृति वाले व्यक्तियों को रात के समय चावल खाने से विशेष रूप से परहेज करना चाहिए। रात में पाचन अग्नि मंद होती है और चावल का भारी व ठंडा स्वभाव रात के समय कफ और वात दोनों दोषों को असंतुलित कर सकता है, जिससे पेट फूलना, गैस या सर्दी-खांसी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। सुदामा/ईएमएस 16 अप्रैल 2026