राष्ट्रीय
16-Apr-2026


बिल पारित करने के लिए सरकार के पास लोकसभा में 67 और राज्यसभा में 21 वोट कम संसद में अटक सकता है नारी शक्ति वंदन विधेयक! -लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 360, वहीं राज्यसभा में जादुई आंकड़ा 163 है - लोकसभा में सत्ताधारी दल के पास 293 सदस्य तो राज्यसभा में 142 सदस्य हैं नई दिल्ली(ईएमएस)। संसद के विशेष सत्र के दौरान केंद्र सरकार ने गुरुवार को लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन बिल पेश किए। संसद में आज एक साथ तीन विधेयक पेश किए जाने वाले हैं। परिसीमन विधेयक को छोडक़र अन्य दो विधेयक संविधान संशोधन विधेयक हैं। इन्हें पारित करने के लिए संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। विपक्ष का वॉकआउट बहुमत के आंकड़े को कम कर सकता है। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 है। सत्ताधारी दल के पास 293 सदस्य हैं, यानी उसे अभी भी 67 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है। राज्यसभा में बहुमत के लिए जादुई आंकड़ा 163 है। सत्तापक्ष की वर्तमान ताकत 142 के आसपास है, जो उसे बहुमत के आंकड़े से 21 सीट दूर रखती है। यानी वोटिंग में अगर विपक्षी पार्टियों ने वाक आउट नहीं किया और विरोध में मतदान किया तो नारी शक्ति वंदन विधेयक संसद में अटक सकता है। विपक्ष का कहना है कि वे महिला आरक्षण के समर्थक हैं, लेकिन सरकार द्वारा इसे परिसीमन और 2029 के चुनावों से जोडऩे के कारण वे इन विधेयकों का विरोध करने को मजबूर हैं। तीन दिन तक चलने वाले इस सत्र में केंद्र सरकार की तरफ से तीन विधेयक पेश किए गए हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम और परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर पूरे देश की नजर है। इसे लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच रार छिड़ी है। चूंकि संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण लाने और सीटों को बढ़ाने के लिए संविधान के कुछ प्रावधानों में संशोधन की जरूरत होगी, इसलिए इसे संविधान संशोधन प्रस्ताव कहा जा रहा है। विशेष बहुमत किसी भी संविधान संशोधन विधेयक (जैसे- संविधान 131वां संशोधन विधेयक) को संसद के दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा में विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य है। विशेष बहुमत का मतलब है, जहां आसान बहुमत (सिंपल मैजोरिटी) के जरिए किसी भी विधेयक को 50 फीसदी से ज्यादा सदस्यों की सहमति से पारित कराया जा सकता है, वहीं संविधान में बदलाव के प्रस्तावों के लिए यह विशेष बहुमत जरूरी है। आधे राज्यों की सहमति यदि कोई संविधान संशोधन देश के संघीय ढांचे, शक्तियों के बंटवारे, या संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व को बदलता है, तो संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की तरफ से भी इसे साधारण बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक होता है। हालांकि, हर संविधान संशोधन में यह जरूरी नहीं है। आधे राज्यों की सहमति सिर्फ संविधान के मूलभूत ढांचे में बदलाव की स्थिति में लागू होती है। संविधान संशोधन विधेयक होने की वजह से महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक को कानून बनाने के लिए पहले चरण में इसे संसद में पारित कराना होगा। शर्त यह है कि मतदान के लिए सदन के 543 कुल सदस्यों में से कम से कम सदन के 50 फीसदी सदस्य (272) मौजूद होने ही चाहिए। साथ ही इसे पारित कराने के लिए विशेष बहुमत यानी सदन में मौजूद सदस्यों का दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की जरूरत होगी। यानी करीब 362 सांसदों के समर्थन की जरूरत। विपक्ष के सहयोग के बिना पास नहीं होगा बिल संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत के नियम की वजह से ही सत्ता पक्ष को विपक्ष के समर्थन की आवश्यकता पड़ रही है। 543 सदस्यों की प्रभावी क्षमता के साथ दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा लगभग 362 है। मौजूदा समय में लोकसभा में 540 सांसद हैं। यानी अब जादुई आंकड़ा 360 हो जाता है। लोकसभा में अगर एनडीए का संख्याबल देखें तो सामने आता है कि उसके पास फिलहाल 293 सांसद हैं। इनमें अकेले भाजपा के पास 240 सांसद हैं। इसके बाद दो और पार्टियों- तेदेपा और जदयू के पास क्रमश: 16 और 12 सीटें हैं। वहीं, शिवसेना के पास सात और लोजपा के पास पांच सांसद हैं। इन पांच पार्टियों को ही मिला दें तो एनडीए बहुमत के आंकड़े के पार पहुंच जाता है। वहीं, छोटी-बड़ी सभी पार्टियों का साथ रहने पर 293 वोट एनडीए को मिलना तय हैं। यानी उसे 67 अन्य सदस्यों के सहयोग की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी तरफ विपक्षी इंडिया गठबंधन के पास 235 सीटें हैं, जो कि भाजपा से भी पांच सीट कम हैं। इनमें कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, जिसके पास 98 सीटें हैं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के पास 37, तृणमूल कांग्रेस के पास 28 और डीएमके के पास 22 सीटें हैं। गठबंधन की बाकी पार्टियों के पास 10 से कम सीटें हैं। यानी अगर विपक्ष एकजुट रहता है तो इस विधेयक की राह मुश्किल हो सकती है। इन नियमों के चलते, वोटिंग के दौरान विपक्ष द्वारा सदन का बहिष्कार करने या मतदान से दूर रहने की स्थिति में भी सरकार के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना मुश्किल हो सकता है। विनोद उपाध्याय / 16 अप्रैल, 2026