अंतर्राष्ट्रीय
17-Apr-2026


-अमेरिका की बढी चिंता, ताइवान सरकार ने बताया लोकतंत्र के खिलाफ बीजिंग,(ईएमएस)। ताइवान की प्रमुख विपक्षी पार्टी कुओमिन्तांग (केएमटी) की अध्यक्ष चेंग ली-वुन ने हाल ही में बीजिंग की अपनी ऐतिहासिक यात्रा पूरी की, जहां उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। पिछले 10 सालों में यह पहली बार है जब ताइवान के किसी बड़े विपक्षी नेता ने चीन का दौरा किया है और सीधे जिनपिंग से बातचीत की। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ताइवान में अपने चीन समर्थक रुख के कारण एकता की देवी के नाम से मशहूर ली-वुन की इस यात्रा को चीन एक चीन नीति के समर्थन के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जबकि ताइवान की मौजूदा लोकतांत्रिक सरकार इसे अपने लोकतंत्र के खिलाफ मान रही है। इस घटनाक्रम ने अमेरिका समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी चिंता में डाल दिया है, क्योंकि चीन ताइवान को लुभाने के लिए नए दांव खेल रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक चेंग ली-वुन, जो 2025 में केएमटी अध्यक्ष बनीं, शुरुआत से ही ताइवान और चीन के पुनर्मिलन की पक्षधर रही हैं। उन्होंने बीजिंग में खुलकर कहा कि दोनों देशों के लोगों का एक होना एक सपना है। शी जिनपिंग ने इस मुलाकात का फायदा उठाते हुए दो टूक चेतावनी दी कि वे ताइवान की आजादी को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे। चीन लंबे समय से ताइवान को अपना हिस्सा मानता रहा है और उसे मुख्य भूमि में मिलाना चाहता है। इस बार उसने ताइवान की आंतरिक राजनीति का सहारा लिया है। रिपोर्ट के मुताबिक केएमटी का स्वागत इसलिए किया गया क्योंकि यह पार्टी 1992 कंसेंसस का समर्थन करती है, जिसका अर्थ है कि ताइवान जलडमरूमध्य के दोनों ओर एक ही चीन का हिस्सा हैं। चीन ताइवान की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को दरकिनार कर विपक्षी दल के जरिए अपनी जमीन तैयार कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक ताइवान की मौजूदा सरकार ने इस मुलाकात पर कड़ी आपत्ति जताई है। ताइवान के शीर्ष नीति निर्माता चिउ चुई-चेंग ने साफ किया कि लोग अपने भविष्य का फैसला खुद कर सकते हैं और चीन को लोकतांत्रिक सरकार से ही बात करनी चाहिए। वहीं, अमेरिका ने भी चीन को कड़ा संदेश दिया है, जिसमें उसे ताइवान के पास सैन्य अभ्यास बंद करने और ताकत दिखाने के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाने की सलाह दी गई है। चीन ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते को अलगाववादी मानता है और इसलिए उनसे बात करने के बजाय केएमटी जैसे दलों को बढ़ावा दे रहा है। इस यात्रा की टाइमिंग भी अहम है, क्योंकि अमेरिका ईरान जैसे अन्य वैश्विक संकटों में उलझा है, जिससे बीजिंग को ताइवान पर प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल गया है। चीन एक तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसने ताइवान के पास 100 से ज्यादा नौसैनिक जहाज तैनात कर दिए हैं, जो उसके दोहरे रुख को दर्शाता है। उसकी गिरती अर्थव्यवस्था भी उसे आर्थिक रिश्ते सुधारने पर मजबूर कर रही है, लेकिन कब्जा करने का उसका दीर्घकालिक इरादा बरकरार है। सिराज/ईएमएस 17अप्रैल26