तेहरान (ईएमएस)। आधुनिक युद्ध के मैदान में अक्सर यह माना जाता है कि जिसकी तकनीक सबसे महंगी और उन्नत है, जीत उसी की होगी। लेकिन हालिया संघर्षों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। आसमान में करोड़ों की लागत से उड़ते लोहे के शिकारी बाज और नीचे जमीन पर झाड़ियों में छिपा एक गुमनाम सिपाही, जिसके कंधे पर महज चंद लाख की एक नली है, आज महाशक्तियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। सन्नाटा तब टूटता है जब एक छोटी सी चिंगारी निकलती है और देखते ही देखते अजेय माना जाने वाला अमेरिकी फाइटर जेट आग का गोला बनकर रेगिस्तान की धूल फांकने लगता है। अमेरिकी नेतृत्व द्वारा विमानों की सुरक्षा के तमाम दावों के बीच ईरान के मैन पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम यानी मैनपेडस ने यह साबित कर दिया है कि युद्ध केवल महंगी तकनीक से नहीं, बल्कि सही निशाने और रणनीतिक हथियार से जीते जाते हैं। ईरान का महज 1.25 करोड़ रुपये की लागत वाला स्वदेशी मिसाघ मैनपैडस, करीब 930 करोड़ रुपये की कीमत वाले अमेरिकी एफ-15 स्ट्राइक ईगल जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों पर भारी पड़ रहा है। यह एक कंधे पर रखकर चलाई जाने वाली सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी गतिशीलता है। इसे एक अकेला सैनिक कहीं भी ले जा सकता है और रडार की नजरों से बचकर हमला कर सकता है। अधिकांश मैनपैडस इन्फ्रारेड होमिंग यानी हीट-सीकिंग तकनीक का उपयोग करते हैं, जो सीधे विमान के इंजन से निकलने वाली गर्मी को अपना निशाना बनाते हैं। इसमें लगा लगभग 2 किलोग्राम का हाई-एक्सप्लोसिव वारहेड किसी भी विमान के संवेदनशील हिस्सों को तबाह करने के लिए पर्याप्त है। 4 से 8 किलोमीटर की रेंज और 15,000 फीट की ऊंचाई तक मार करने की क्षमता रखने वाला यह हथियार पैसिव गाइडेंस पर काम करता है। इसका मतलब है कि यह कोई सिग्नल नहीं छोड़ता, जिससे पायलट के रडार वॉर्निंग सिस्टम को हमले का पता बहुत देरी से चलता है। ईरान के ऊबड़-खाबड़ और पहाड़ी भूगोल में इन मिसाइलों को छिपाना बेहद आसान है, जिसके कारण अमेरिकी वायुसेना के लिए लो-एल्टीट्यूड मिशन आत्मघाती साबित हो रहे हैं। इस छोटे से हथियार ने दो दशकों में पहली बार दुनिया की सबसे शक्तिशाली वायुसेना को गंभीर संकट में डाल दिया है। वीरेंद्र/ईएमएस 19 अप्रैल 2026