इस्लामाबाद (ईएमएस)। पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की तेहरान यात्रा ने वैश्विक कूटनीति में एक विरोधाभासी स्थिति बना दी है। एक ओर मुनीर पर पहलगाम जैसे जघन्य आतंकी हमलों की साजिश रचने और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने के आरोप हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के खतरों को कम करने के लिए उन्हें एक मध्यस्थ के रूप में दिखा जा रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता के पहले दौर की विफलता के बाद, मुनीर वाशिंगटन का एक नया प्रस्ताव लेकर तेहरान पहुंचे। इस आखिरी दांव का उद्देश्य युद्ध की स्थिति को टालना है। रिपोर्टों के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन और ईरानी नेताओं ने मुनीर के प्रयासों की सराहना की है। यह वहीं पाकिस्तान है जो दशकों से आतंकवाद का केंद्र रहा है, लेकिन आज अपनी भौगोलिक स्थिति और सैन्य प्रभाव के कारण अप्रत्याशित डिप्लोमेटिक ब्रिज बनकर उभरा है। पाकिस्तान की सत्ता का असली केंद्र एक बार फिर रावलपिंडी (सेना मुख्यालय) साबित हुआ है। पूर्व राजदूत मलीहा लोधी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का भरोसा निर्वाचित सरकार के बजाय मुनीर पर अधिक है। मुनीर ने ट्रंप के करीब आने के लिए 5 मिलियन डालर खर्च किए और पाकिस्तान के तेल, खनिज तथा क्रिप्टो बाजार तक पहुंच का लालच दिया। उन्होंने सऊदी अरब के साथ रक्षा सौदे किए, लेकिन ईरान के खिलाफ युद्ध में सीधे शामिल होने से बचकर अपनी उपयोगिता बनाए रखी। पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुनीर की इस शांति वार्ता के पीछे एक गहरा सामरिक हित छिपा है। वे सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र के साथ मिलकर एक क्वाड जैसा गुट बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के खिलाफ एक इस्लामिक गठबंधन तैयार करना है, जो भविष्य के किसी भी संघर्ष में पाकिस्तान के लिए सुरक्षा कवच (सीलड) का काम कर सके। जियो पॉलिटिक्स का यह क्रूर चेहरा है कि जिस जनरल के हाथ मासूमों के खून से रंगे हैं, आज विश्व शांति की चाबी सौंपी जा रही है। असीम मुनीर की यह शांति दूत की छवि केवल एक मुखौटा है, जिसके पीछे का असली मकसद पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था को बचाना और भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मोर्चेबंदी करना है। आशीष/ईएमएस 19 अप्रैल 2026