लेख
21-Apr-2026
...


(दावानल के प्रमुख कारण, प्रभाव और समाधान) अप्रैल का महीना चल रहा है और विशेषकर उत्तर भारत में इन दिनों भीषण गर्मी पड़ रही है तथा तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। हालांकि, पहाड़ों में मैदानी इलाकों की तुलना में सुबह-शाम के समय थोड़ी राहत अवश्य है, किंतु अब वहां भी पहले की अपेक्षा तापमान में काफी वृद्धि देखने को मिल रही है। पहाड़ों के वन क्षेत्रों में आग लगने के अनेक प्रमुख कारण होते हैं, और गर्मियों के मौसम में इसका खतरा अधिक बढ़ जाता है। वास्तव में धरती का तापमान बढ़ने, वातावरण के शुष्क होने तथा वर्षा कम होने से पेड़-पौधों, झाड़ियों और वनस्पतियों की सूखी पत्तियां, घास तथा टहनियां शीघ्र आग पकड़ लेती हैं। प्रायः देखा जाता है कि तेज हवाओं के साथ चीड़ के जंगलों में आग तेजी से फैलती है। दरअसल, पहाड़ी क्षेत्रों में चीड़ के वन अधिक पाए जाते हैं और चीड़ की सूखी पत्तियां अत्यंत ज्वलनशील होती हैं। थोड़ी-सी चिंगारी भी इन्हें तुरंत सुलगा देती है, जिससे आग शीघ्र फैल जाती है। इससे पर्यावरण को हानि पहुंचती है तथा वन्यजीवों और वनस्पतियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। बहुत बार पहाड़ों में आने वाले पर्यटकों अथवा स्थानीय लोगों द्वारा बीड़ी, सिगरेट, माचिस की तीली, अलाव या कूड़ा जलाने के कारण भी जंगलों में आग लग जाती है। इसके अतिरिक्त, कुछ स्थानों पर किसान सूखी झाड़ियों या खेत साफ करने के लिए आग लगाते हैं, जो हवा के कारण जंगलों तक पहुंच जाती है। कई क्षेत्रों में झूम कृषि जैसी पद्धतियां भी वनाग्नि का कारण बनती हैं। पहाड़ों में तेज हवा चलने से छोटी-सी आग भी तेजी से फैल जाती है, क्योंकि ऑक्सीजन दहन को बढ़ावा देती है। साथ ही, पहाड़ी ढलानों पर आग ऊपर की ओर बहुत तीव्र गति से बढ़ती है। कभी-कभी आकाशीय बिजली गिरने या चट्टानों के घर्षण जैसे प्राकृतिक कारणों से भी आग लग सकती है, हालांकि; ऐसे मामले अपेक्षाकृत कम होते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण भी जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। वनों में लगने वाली आग का पशु-पक्षियों के आवासों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उन्हें सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करना पड़ता है। भीषण आग से पूरा क्षेत्र धुएं के गुबार से ढक जाता है, जिससे लोगों को आंखों में जलन, बुजुर्गों और बच्चों को सांस लेने में कठिनाई जैसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाकों में वनाग्नि पर काबू पाना अत्यंत कठिन कार्य है। यद्यपि फायर ब्रिगेड, वन विभाग और स्थानीय लोग आग बुझाने का प्रयास करते हैं, फिर भी यह बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए विशेष रूप से गर्मियों में हमें वनों को आग से बचाने के लिए अपने यथासंभव प्रयास करने चाहिए, क्योंकि वन हैं तो हम हैं।साथ ही सरकार, प्रशासन और वन विभाग को भी अतिरिक्त बल, आधुनिक संसाधन और प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध करानी चाहिए, ताकि इस गंभीर समस्या पर समय रहते नियंत्रण पाया जा सके। अतः स्पष्ट है कि पहाड़ी वनाग्नि केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि मानवजनित कारणों से भी अधिक होती है। विशेष रूप से गर्मियों में सावधानी, जन-जागरूकता और समय पर नियंत्रण द्वारा इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। (-सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 21 अप्रैल 26