-प्राचीन ईरानी धर्म और देवता अहुर मज्दा से जुड़ाव नई दिल्ली,(ईएमएस)। दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य अब जंग का मैदान बनने के कारण सुर्खियों में है। तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति के कारण भी इसकी ख्याति दुनियाभर में है। इस समुद्री गलियारे का नाम होर्मुज कैसे पड़ा इस सवाल पर बताया जा रहा है कि इसका नाम हजारों साल पुराने धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा हुआ है। जानकारी के अनुसार ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, “होर्मुज” नाम की जड़ें प्राचीन फारसी सभ्यता और पारसी धर्म से जुड़ी हैं। माना जाता है कि यह नाम समय के साथ विकसित होकर आधुनिक रूप में स्थापित हुआ, और इसका संबंध अहुर मज्दा से जोड़ा जाता है, जिन्हें प्रकाश, सत्य और न्याय का प्रतीक माना जाता है। अहुर मज्दा को पारसी धर्म में सर्वोच्च देवता माना गया है, जिन्हें ब्रह्मांड के निर्माता और व्यवस्था के संरक्षक के रूप में पूजा जाता था। लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में पैगंबर जरथुस्त्र द्वारा स्थापित इस धर्म में अहुर मज्दा को अच्छाई और सत्य की शक्ति का प्रतिनिधि माना गया। इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन काल में इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले व्यापारी और नाविक सुरक्षित यात्रा के लिए इसी दिव्य शक्ति का स्मरण करते थे। इसी आस्था और सांस्कृतिक प्रभाव के कारण इस क्षेत्र का नाम “होर्मुज” से जुड़ गया। पारसी धर्म में अहुर मज्दा को अंधकार और विनाश की शक्तियों के खिलाफ सत्य और प्रकाश का रक्षक माना गया है। उनके दर्शन में “स्पेंटा मैन्यु” और “अंग्रा मैन्यु” जैसी अवधारणाएं अच्छाई और बुराई के संघर्ष को दर्शाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य का नाम केवल एक भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि यह उस प्राचीन ईरानी सभ्यता की गहरी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रतीक है, जो इस्लाम से पहले इस क्षेत्र की आत्मा मानी जाती थी। आज भले ही यह जलडमरूमध्य वैश्विक राजनीति और ऊर्जा आपूर्ति के कारण चर्चा में रहता हो, लेकिन इसका नाम हमें उस इतिहास की याद दिलाता है, जिसमें आस्था, दर्शन और सभ्यता का गहरा प्रभाव रहा है। इस तरह, होर्मुज सिर्फ एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि प्राचीन विश्वासों और मानव सभ्यता की ऐतिहासिक यात्रा का एक जीवंत प्रतीक भी है। हिदायत/ईएमएस 21 अप्रैल 2026