राष्ट्रीय
22-Apr-2026
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-पश्चिम बंगाल ने 2024-25 में 96.7 और मध्य प्रदेश ने 94.3 फीसदी का उपयोग किया नई दिल्ली,(ईएमएस)। देश के विकास की रफ्तार को लेकर एक तस्वीर सामने आई है। एसबीआई रिसर्च की ताजा रिपोर्ट कहती है कि केंद्र सरकार लगातार राज्यों को पैसा दे रही है, लेकिन कई राज्य उस पैसे का फायदा नहीं उठा पा रहे। हालात ऐसे हैं कि अगर राज्य खुद आगे बढ़कर खर्च नहीं बढ़ाते, तो विकास की रफ्तार अधूरी ही रह जाएगी। रिपोर्ट से पता चलता है कि सिर्फ केंद्र की मदद से काम नहीं चलेगा, राज्यों को भी जेब ढीली करनी होगी, तभी असली विकास दिखेगा। बता दें पिछले 5 साल में केंद्र सरकार ने एसएएससीआई योजना के तहत राज्यों को करीब 4.5 लाख करोड़ रुपए दिए। इससे राज्यों का पूंजीगत खर्च जरूर बढ़ा और अर्थव्यवस्था को सहारा मिला, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। पहले जहां सभी राज्य इस फंड का पूरा इस्तेमाल कर रहे थे, वहीं अब कई राज्यों के बीच फर्क नजर आने लगा है। कहीं पैसा सही से लग रहा है, तो कहीं काम अटक रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2023-24 और 2024-25 के आंकड़ों में कई राज्यों के बीच एसएएससीआई उपयोग दर में बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है। कुछ राज्य अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि कई अन्य पीछे छूट गए हैं। उदाहरण के लिए, पंजाब ने 2023-24 में केवल 6.5फीसदी का उपयोग किया, जबकि मणिपुर की दर 35.7फीसदी और त्रिपुरा की 73.8फीसदी रही। वहीं, पश्चिम बंगाल ने 2024-25 में 96.7फीसदी और मध्य प्रदेश ने 94.3फीसदी का उपयोग कर बेहतर प्रदर्शन किया है। रिपोर्ट में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि जिन राज्यों पर कर्ज का बोझ ज्यादा है, वहां विकास से जुड़ा खर्च करना मुश्किल है। इन राज्यों की कमाई का बड़ा हिस्सा पहले से लिए गए कर्ज का ब्याज चुकाने और पुराने खर्चों को संभालने में ही निकल जाता है। ऐसे में उनके पास नए प्रोजेक्ट्स, सड़क, पुल, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कामों पर खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा बचता ही नहीं। पंजाब, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि इन राज्यों का कर्ज जीडीपी के मुकाबले काफी ज्यादा है। इसका सीधा असर यह होता है कि सरकार को अपने बजट का बड़ा हिस्सा वेतन, सब्सिडी, पेंशन और ब्याज चुकाने में लगाना पड़ता है। इसे ही राजस्व खर्च कहा जाता है। जब राजस्व खर्च बढ़ जाता है, तो पूंजीगत खर्च यानी कैपेक्स के लिए जगह कम बचती है। इसका दूसरा असर यह है कि ऐसे राज्य केंद्र से मिलने वाली एसएएससीआई जैसी योजनाओं का पैसा भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर पाते। क्योंकि सिर्फ पैसा मिलना ही काफी नहीं होता, उसे जमीन पर प्रोजेक्ट में बदलने के लिए प्रशासनिक क्षमता और अतिरिक्त फंड भी चाहिए होता है। कर्ज में दबे राज्यों के पास यह क्षमता कमजोर पड़ जाती है। एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई है कि जिन राज्यों में युवा आबादी ज्यादा है, वहां इस योजना का इस्तेमाल बेहतर हुआ है। वहीं जिन राज्यों में बुजुर्ग आबादी ज्यादा है, वहां खर्च कम दिखा। हालांकि हर राज्य की अपनी स्थिति भी मायने रखती है, इसलिए एक ही कैटेगरी में भी फर्क देखने को मिलता है। रिपोर्ट में एक और बात सामने आई है! कई राज्य अब लोगों को सीधे पैसा देने वाली योजनाओं पर तेजी से खर्च बढ़ा रहे हैं। झारखंड, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य इसमें सबसे आगे हैं। यानी सरकारें लोगों के खाते में सीधे पैसे डाल रही हैं या ऐसी स्कीम चला रही हैं जिनका सीधा फायदा जनता को मिलता है। लेकिन यहां एक बड़ी दिक्कत भी है। जब सरकार का ज्यादा पैसा इन योजनाओं में चला जाता है, तो विकास के कामों के लिए फंड कम पड़ने लगता है। सड़क, पुल, बिजली, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए जो पैसा लगना चाहिए, वह धीरे-धीरे कम हो जाता है। सिराज/ईएमएस 22अप्रैल26