2024 में इसका टेस्ट मल्टीपल इंडिपेंडेंट री-एंट्री व्हीकल्स के साथ किया गया था नई दिल्ली,(ईएमएस)। भारत ने 3 अप्रैल 2026 को आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में शिप बिल्डिंग सेंटर में आईएनएस अरिदमन, देश की तीसरी परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी को चुपचाप नौसेना में शामिल कर लिया। ये एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि भारत ने इस ऐतिहासिक कामयाबी का जश्न नहीं मनाया और कोई औपचारिक घोषणा भी नहीं की, लेकिन देश के रक्षा मंत्री ने एक पोस्ट में कहा शब्द नहीं शक्ति, अरिदमन। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आईएनएस अरिदमन को भारतीय नौसेना में शामिल होना कई मायनो में काफी अहम है। समुद्र में एक एसएसबीएन की मौजूदगी तय करती है कि देश के पास जवाबी हमला करने की क्षमता मौजूद है। हालांकि भारत पहले परमाणु बम इस्तेमाल नहीं करने की नीति को मानता है कि लेकिन हमला होने की स्थिति में तत्काल परमाणु हमला करने की क्षमता भी रखता है। इस सिद्धांत को पूरा करने के लिए कम से कम तीन पनडुब्बियों की जरूरत होती है। जिसका मतलब होता है कि एक पनुडुब्बी हमेशा गश्त पर रह सके और बाकी दो पनडुब्बियों का रखरखाव और मरम्मत हो सके। भारत की पहली स्वदेशी एसएसबीएन, आईएनएस अरिहंत को 1980 के दशक में शुरू हुए एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल प्रोग्राम के तहत एक टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर के तौर पर विकसित किया गया था। 6000 टन वाली और 83 एमडब्ल्यू के रिएक्टर से चलने वाली अरिहंत को 2009 में तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह की सरकार में पानी में उतारी थी और अगस्त 2016 में इसे चुपचाप नौसेना में शामिल कर लिया गया था। नवंबर 2018 में पीएम मोदी ने ट्विटर पर बताया था कि आईएनएस अरिहंत अपनी पहली डिटरेंस पेट्रोल से लौट आई है। इसका मतलब था कि वह परमाणु-हथियारों से लैस मिसाइलों के साथ तैनात थी। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत का न्यूक्लियर ट्रायड जिसमें मिसाइलें, विमान और पनडुब्बियां शामिल हैं अब पूरा हो चुका था। अब भारत जमीन से, आकाश से और समंदर से परमाणु हमला करने की क्षमता रखता है और ये क्षमता सिर्फ अमेरिका, रूस, चीन और फ्रांस के पास ही है। दूसरी एसएसबीएन, आईएनएस अरिघाट (एस3) को अगस्त 2024 में नौसेना में शामिल किया गया था। आईएनएस अरिदमन के शामिल होने से अब भारत को वह तीसरी पनडुब्बी मिल गई है जिसकी उसे समुद्र में लगातार निवारक क्षमता बनाए रखने के लिए जरूरत थी। एक रिसर्च रिपोर्ट में बताया है कि भारत लंबे समय से पृथ्वी और अग्नि सीरीज की बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल कर रहा है। अग्नि-5 की रेंज सबसे ज्यादा 5,000 किलोमीटर से भी ज्यादा है और इसे एक कैनिस्टर में रखा जाता है जिससे इसे स्टोर करना, एक जगह से दूसरी जगह ले जाना और ऑपरेट करना आसान है। 2024 में इसका टेस्ट मल्टीपल इंडिपेंडेंट री-एंट्री व्हीकल्स के साथ किया गया था यानी कई वॉरहेड जो अलग-अलग जगहों को निशाना बना सकते हैं। न्यूक्लियर डिलीवरी में सक्षम लड़ाकू विमानों में मिराज-2000, सुखोई-30 और राफेल शामिल हैं। हालांकि, इस ट्रायड के तीन हिस्सों में से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस न्यूक्लियर सबमरीन को सबसे ज्यादा सुरक्षित और असरदार माना जाता है। सिराज/ईएमएस 25अप्रैल26 -------------------------------